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साल 2150 · आख़िरी पनाह

एक जहाज़। दो दुनियाएँ। इंसानियत की एक जंग।

धरती का ज़्यादातर हिस्सा समंदर की लहरों में खो चुका है। एक विशाल जहाज़ अपने साथ बचे हुए इंसानों की उम्मीदें लेकर आगे बढ़ रहा है। लेकिन इस जहाज़ पर कौन कितनी महफ़ूज़ ज़िंदगी जी सकता है, यह इस बात पर निर्भर करता है कि उसकी जगह किस डेक पर है। आइए, उस दुनिया में कदम रखिए जहाँ ज़िंदा बच जाना ही संघर्ष का अंत नहीं है।

शहाब ख़ान के उपन्यास “आख़िरी ठिकाना” का आधिकारिक हिंदी कवर
शहाब ख़ान का उपन्यास

आख़िरी ठिकाना

एक जहाज़ · दो दुनियाएँ
समंदर में सफ़र · तूफ़ानी हालात
जहाज़ के बाहर की दुनिया

धरती समंदर में
डूब चुकी है।

साल 2150। उस सभ्यता के ऊपर अब दूर-दूर तक पानी फैला है, जिसे कभी यक़ीन था कि वह प्रकृति को अपने क़ाबू में रख सकती है।

उपन्यास की काल्पनिक दुनिया में बढ़ता तापमान, पिघलती बर्फ़, उजड़ते प्राकृतिक ठिकाने और बढ़ते समुद्र ने इंसान के लिए सुरक्षित रहने की जगह लगभग ख़त्म कर दी है। कुछ छोटे द्वीप अब भी बाक़ी हैं, लेकिन वहाँ के हालात इतने ख़राब हैं कि उन्हें बच निकलने की जगह नहीं कहा जा सकता।

वह दुनिया, जहाँ कभी ज़मीन, जंगल और तरह-तरह के जीव-जंतु थे, अब एक बेरहम समंदर बन चुकी है। उसी समंदर के किसी हिस्से में एक अनोखा जहाज़ उन लोगों की उम्मीद सँभाले हुए है, जो इस तबाही से बच पाए हैं।

2150उपन्यास में कल्पना किया गया भविष्य
एक जहाज़पनाह देने वाली, लेकिन नाज़ुक-सी जगह
ज़मीन नहींनाइंसाफ़ी से बचकर निकल जाने का कोई आसान रास्ता नहीं
डूबी हुई काल्पनिक दुनिया की चित्रात्मक झलक
पनाहगाह के भीतर आइए

सिर्फ़ एक
जहाज़ नहीं।

तकनीक के सहारे चलती एक तैरती दुनिया, जो समंदर से तो सुरक्षित है, लेकिन बराबरी से कोसों दूर।

समंदर में लंबे समय तक ज़िंदगी चलाने के लिए बनाए गए “आख़िरी ठिकाना” में सौर ऊर्जा, आधुनिक तरीक़ों से भोजन पैदा करने की व्यवस्था और पानी को साफ़ करके दोबारा इस्तेमाल करने के सिस्टम मौजूद हैं। इंजीनियर और मज़दूर बाहर के ख़तरनाक हालात में भी इन सभी व्यवस्थाओं को चलाए रखते हैं।

लेकिन यह जहाज़ इंसानियत को बचाने के लिए बनाया गया था, यह तय करने के लिए नहीं कि आराम से जीने का हक़ किसे मिलेगा। इसकी दीवारों के भीतर नाइंसाफ़ी पर टिका एक नया सामाजिक ढाँचा बन रहा है।

जहाज़ की छिपी दुनिया देखिए ↗
☀ऊर्जा और मशीनेंबिजली, मरम्मत और लगातार देखभाल
✳भोजन का इंतज़ामआधुनिक खेती से चलती ज़िंदगियाँ
◉पानी को दोबारा साफ़ करनासबकी ज़रूरत, लेकिन सबको बराबर नहीं मिलता
✚इलाज की सुविधाआधुनिक अस्पताल, लेकिन इलाज तक पहुँच में फ़र्क़
जहाज़ के भीतर सबसे गहरी खाई

दो दुनियाएँ।
एक जहाज़।

समंदर वही। जहाज़ वही। लेकिन ज़िंदगियों में ज़मीन-आसमान का फ़र्क़।

ऊपर · ख़ास सुविधाओं वाले लोग

ऊपरी डेक

ताज़ा खाना, साफ़ और छनकर आती हवा, निजी आराम और सत्ता की हिफ़ाज़त। कुछ लोगों के लिए दुनिया ख़त्म हो जाने के बाद भी ऐशो-आराम ख़त्म नहीं हुआ।

नीचे · काम करने वाले लोग

निचला डेक

तंग कमरों में ज़िंदगी, सीमित खाना और पानी, थकाने वाली ड्यूटी और लगातार निगरानी। जिनके दम पर जहाज़ चल रहा है, उन्हीं को इंसान समझे जाने के लिए जूझना पड़ता है।

असमानता रोज़ की ज़िंदगी में

दुनिया छोटी हो जाए, तब भी नाइंसाफ़ी ख़त्म नहीं होती।

“आख़िरी ठिकाना” पर अमीरी-ग़रीबी सिर्फ़ पहचान नहीं है। उससे तय होता है कि कौन क्या खाएगा, कहाँ सोएगा, उसके साथ कैसा बर्ताव होगा और उसकी बात कितनी सुनी जाएगी।

रोज़ की ज़िंदगीऊपरी डेकनिचला डेक
खाना और पानीताज़ा और भरपूरनपा-तुला, कम और घटिया
कमरे और हवाआरामदेह कमरे, साफ़ हवातंग, गंदे कमरे
वक़्त और कामआराम और सुरक्षाथकाने वाली मज़दूरी और मरम्मत
सेहतआधुनिक अस्पतालइलाज की ज़रूरत, लेकिन बराबर पहुँच नहीं
ताक़तहुक्म और विशेष अधिकारनिगरानी और कड़ी सज़ा
ज़िंदा रहने और इज़्ज़त से जीने की कहानी

जब उम्मीद ही
क़ैद बन जाए।

जहाज़ ने उनकी जान तो बचा ली। अब सवाल है कि उन्हें कैसी ज़िंदगी जीने दी जाएगी।

बाढ़ में अपने माता-पिता को खोने के बाद आना अपने छोटे भाई सैम के साथ इस जहाज़ पर पहुँची। निचले डेक पर उसका हर दिन काम, भूख और सज़ा के डर के बीच गुज़रता है। उसके आसपास ऐसे लोग हैं जिनकी मेहनत और हुनर से यह पूरी दुनिया चल रही है, लेकिन जिन्हें उनकी क़ीमत तक नहीं दी जाती।

कैप्टन रेडफोर्ड का मानना है कि इस नाज़ुक पनाहगाह को सिर्फ़ सख़्त क़ाबू में रखकर ही बचाया जा सकता है। मगर जब दबे हुए सवाल इज़्ज़त से जीने की माँग बनने लगते हैं, तो जहाज़ पर छाई ख़ामोशी में भी बदलाव आने लगता है।

यह तकलीफ़, हिम्मत, ज़मीर और एक-दूसरे के साथ खड़े होने की कहानी है। आगे का सफ़र क्या मोड़ लेगा, यह आपको ख़ुद किताब में जानना है।

साल 2150सामाजिक बँटवाराजलवायु पर आधारित कल्पनाकहानी के अंत का राज़ नहीं
जहाज़ के लोगों से मिलिए →
एक इंसान कितना कुछ सहने के बाद यह पूछने लगता है कि सिर्फ़ बच जाना काफ़ी है, या इंसाफ़ भी ज़रूरी है?
जहाज़ पर रहने वाले लोग

आठ ज़िंदगियाँ।
एक ही तक़दीर।

इस जहाज़ पर हर इंसान का अपना संघर्ष है। जानिए उन लोगों के बारे में, जो एक ही जहाज़ पर रहते हुए भी दो बिल्कुल अलग दुनियाओं का हिस्सा हैं।

जहाज़ की रेलिंग के पार

भागने की कोई जगह नहीं।
लेकिन चुनाव करने का मौक़ा अब भी है।

जहाज़ के भीतर चलिए →
जहाज़ को देखिए

जहाज़ के भीतर
की दुनिया।

“आख़िरी ठिकाना” के हर हिस्से को खोलकर देखिए, कमान संभालने वाले सिस्टम और बिजली के कमरों से लेकर उन जगहों तक जहाँ लोग काम करते हैं, आराम करते हैं और मुश्किलों का सामना करते हैं। हर जगह का अपना अलग नज़ारा है।

जहाज़ के किसी हिस्से की कल्पनात्मक तस्वीरआख़िरी ठिकाना · जगह 01
जहाज़ पर

कहानी के आगे, असल दुनिया

यह कहानी
एक चेतावनी है।

उपन्यास में एक बेहद कठिन भविष्य की कल्पना की गई है। मगर पर्यावरण के ख़तरे और जिस नाइंसाफ़ी के बारे में यह हमें सोचने को कहता है, वे आज की दुनिया के असली सवाल हैं।

एक बेहतर कल अभी भी मुमकिन है

भविष्य हमारे
फ़ैसलों पर निर्भर है।

“आख़िरी ठिकाना” में समंदर हमें याद दिलाता है कि इंसानियत क्या कुछ खो सकती है। और जहाज़ के बँटे हुए डेक बताते हैं कि ज़िंदा बचे रहने के बाद भी नाइंसाफ़ी हो सकती है। कहानी का संदेश सिर्फ़ हमें डराकर नहीं रुकता, बल्कि पूछता है कि हम इसका जवाब कैसे देंगे।

जलवायु परिवर्तन या असमानता को कोई एक क़दम ख़त्म नहीं कर सकता। लेकिन विज्ञान, इंसाफ़ पर आधारित नीतियाँ और मिल-जुलकर निभाई गई ज़िम्मेदारी ख़तरे घटा सकती हैं और ज़िंदगियाँ बचा सकती हैं।

कल्पना और हक़ीक़त: किताब में साल 2150 तक धरती के लगभग डूब जाने की स्थिति एक काल्पनिक, भयावह भविष्य की तस्वीर है, वैज्ञानिक भविष्यवाणी नहीं। वास्तविक दुनिया में बढ़ता तापमान, बर्फ़ का कम होना, समुद्र का बढ़ता स्तर और कमज़ोर लोगों पर संकट का ज़्यादा असर वैज्ञानिक तौर पर दर्ज हैं और गंभीर ध्यान माँगते हैं।
01
तापमान बढ़ने की वजहें कम करें

साफ़ ऊर्जा, ऊर्जा का बेहतर इस्तेमाल और वैज्ञानिक सबूतों पर आधारित ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन घटाने के प्रयासों का साथ दें।

02
प्रकृति और जीव-जगत की हिफ़ाज़त करें

उजड़े प्राकृतिक ठिकानों को फिर सँवारें, प्रदूषण और कचरा कम करें और भोजन व ज़िंदगी को सहारा देने वाली प्राकृतिक व्यवस्थाओं का सम्मान करें।

03
ज़िंदा रहने के साधनों में इंसाफ़ लाएँ

खाना, साफ़ पानी, इलाज और आपदा की तैयारी तक सभी की पहुँच हो, ख़ास तौर पर उन लोगों की जो पहले से मुश्किल हालात में हैं।

04
मेहनत और मज़दूरों की इज़्ज़त बचाएँ

अच्छे कामकाजी हालात, मज़दूरों की सुरक्षा, सही बर्ताव और उन्हें प्रभावित करने वाले फ़ैसलों में उनकी आवाज़ का समर्थन करें।

05
जानकारी को काम में बदलें

भरोसेमंद स्रोतों से सीखें, अपने आसपास के लोगों के साथ कोशिशें करें और संस्थाओं से ठोस बदलाव के लिए जवाब माँगें।

शहाब ख़ान की तरफ़ से एक निजी संदेश

लेखक की ओर से

एक कहानी, कुछ सवाल और हमारी आने वाली दुनिया

“आख़िरी ठिकाना” का आधिकारिक हिंदी कवर
शहाब ख़ान का उपन्यासआख़िरी ठिकानाएक जहाज़ · दो दुनियाएँ
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जहाज़ पर चढ़ने से पहले

इस सफ़र से पहले,
कुछ बातें जान लीजिए।

जहाज़, उसमें रहने वाले लोगों और कहानी से जुड़े असल दुनिया के सवालों को थोड़ा और समझिए, बिना कहानी का कोई राज़ खोले।

आख़िरी ठिकाना के लेखक शहाब ख़ान
कहानी के पीछे की सोच

शहाब
ख़ान

हमारी दुनिया, हमारे फ़ैसले और मुश्किल वक़्त में इंसान बने रहने की कहानी।

“आख़िरी ठिकाना” की कल्पना लेखक के मन में इस सवाल से जन्मी कि अगर हम अपनी धरती और पर्यावरण की उपेक्षा करते रहे, तो आने वाली दुनिया कैसी हो सकती है। जहाज़ सामाजिक असमानता का आईना बन गया, जहाँ ताक़तवर लोग आराम से जी सकते हैं, जबकि इस पूरी व्यवस्था को चलाने वालों से उनकी इज़्ज़त छीन ली जाती है।

इस काल्पनिक सफ़र के ज़रिए उपन्यास पाठकों को उस भविष्य पर सोचने के लिए आमंत्रित करता है जिसे वे बचाना चाहते हैं, और उन लोगों के बारे में भी जिन्हें पीछे नहीं छोड़ा जाना चाहिए।

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