धरती का ज़्यादातर हिस्सा समंदर की लहरों में खो चुका है। एक विशाल जहाज़ अपने साथ बचे हुए इंसानों की उम्मीदें लेकर आगे बढ़ रहा है। लेकिन इस जहाज़ पर कौन कितनी महफ़ूज़ ज़िंदगी जी सकता है, यह इस बात पर निर्भर करता है कि उसकी जगह किस डेक पर है। आइए, उस दुनिया में कदम रखिए जहाँ ज़िंदा बच जाना ही संघर्ष का अंत नहीं है।
साल 2150। उस सभ्यता के ऊपर अब दूर-दूर तक पानी फैला है, जिसे कभी यक़ीन था कि वह प्रकृति को अपने क़ाबू में रख सकती है।
उपन्यास की काल्पनिक दुनिया में बढ़ता तापमान, पिघलती बर्फ़, उजड़ते प्राकृतिक ठिकाने और बढ़ते समुद्र ने इंसान के लिए सुरक्षित रहने की जगह लगभग ख़त्म कर दी है। कुछ छोटे द्वीप अब भी बाक़ी हैं, लेकिन वहाँ के हालात इतने ख़राब हैं कि उन्हें बच निकलने की जगह नहीं कहा जा सकता।
वह दुनिया, जहाँ कभी ज़मीन, जंगल और तरह-तरह के जीव-जंतु थे, अब एक बेरहम समंदर बन चुकी है। उसी समंदर के किसी हिस्से में एक अनोखा जहाज़ उन लोगों की उम्मीद सँभाले हुए है, जो इस तबाही से बच पाए हैं।
2150उपन्यास में कल्पना किया गया भविष्य
एक जहाज़पनाह देने वाली, लेकिन नाज़ुक-सी जगह
ज़मीन नहींनाइंसाफ़ी से बचकर निकल जाने का कोई आसान रास्ता नहीं
पनाहगाह के भीतर आइए
सिर्फ़ एक जहाज़ नहीं।
तकनीक के सहारे चलती एक तैरती दुनिया, जो समंदर से तो सुरक्षित है, लेकिन बराबरी से कोसों दूर।
समंदर में लंबे समय तक ज़िंदगी चलाने के लिए बनाए गए “आख़िरी ठिकाना” में सौर ऊर्जा, आधुनिक तरीक़ों से भोजन पैदा करने की व्यवस्था और पानी को साफ़ करके दोबारा इस्तेमाल करने के सिस्टम मौजूद हैं। इंजीनियर और मज़दूर बाहर के ख़तरनाक हालात में भी इन सभी व्यवस्थाओं को चलाए रखते हैं।
लेकिन यह जहाज़ इंसानियत को बचाने के लिए बनाया गया था, यह तय करने के लिए नहीं कि आराम से जीने का हक़ किसे मिलेगा। इसकी दीवारों के भीतर नाइंसाफ़ी पर टिका एक नया सामाजिक ढाँचा बन रहा है।
◉पानी को दोबारा साफ़ करनासबकी ज़रूरत, लेकिन सबको बराबर नहीं मिलता
✚इलाज की सुविधाआधुनिक अस्पताल, लेकिन इलाज तक पहुँच में फ़र्क़
जहाज़ के भीतर सबसे गहरी खाई
दो दुनियाएँ। एक जहाज़।
समंदर वही। जहाज़ वही। लेकिन ज़िंदगियों में ज़मीन-आसमान का फ़र्क़।
ऊपर · ख़ास सुविधाओं वाले लोग
ऊपरी डेक
ताज़ा खाना, साफ़ और छनकर आती हवा, निजी आराम और सत्ता की हिफ़ाज़त। कुछ लोगों के लिए दुनिया ख़त्म हो जाने के बाद भी ऐशो-आराम ख़त्म नहीं हुआ।
VS
नीचे · काम करने वाले लोग
निचला डेक
तंग कमरों में ज़िंदगी, सीमित खाना और पानी, थकाने वाली ड्यूटी और लगातार निगरानी। जिनके दम पर जहाज़ चल रहा है, उन्हीं को इंसान समझे जाने के लिए जूझना पड़ता है।
असमानता रोज़ की ज़िंदगी में
दुनिया छोटी हो जाए, तब भी नाइंसाफ़ी ख़त्म नहीं होती।
“आख़िरी ठिकाना” पर अमीरी-ग़रीबी सिर्फ़ पहचान नहीं है। उससे तय होता है कि कौन क्या खाएगा, कहाँ सोएगा, उसके साथ कैसा बर्ताव होगा और उसकी बात कितनी सुनी जाएगी।
रोज़ की ज़िंदगीऊपरी डेकनिचला डेक
खाना और पानीताज़ा और भरपूरनपा-तुला, कम और घटिया
कमरे और हवाआरामदेह कमरे, साफ़ हवातंग, गंदे कमरे
वक़्त और कामआराम और सुरक्षाथकाने वाली मज़दूरी और मरम्मत
सेहतआधुनिक अस्पतालइलाज की ज़रूरत, लेकिन बराबर पहुँच नहीं
ताक़तहुक्म और विशेष अधिकारनिगरानी और कड़ी सज़ा
ज़िंदा रहने और इज़्ज़त से जीने की कहानी
जब उम्मीद ही क़ैद बन जाए।
जहाज़ ने उनकी जान तो बचा ली। अब सवाल है कि उन्हें कैसी ज़िंदगी जीने दी जाएगी।
बाढ़ में अपने माता-पिता को खोने के बाद आना अपने छोटे भाई सैम के साथ इस जहाज़ पर पहुँची। निचले डेक पर उसका हर दिन काम, भूख और सज़ा के डर के बीच गुज़रता है। उसके आसपास ऐसे लोग हैं जिनकी मेहनत और हुनर से यह पूरी दुनिया चल रही है, लेकिन जिन्हें उनकी क़ीमत तक नहीं दी जाती।
कैप्टन रेडफोर्ड का मानना है कि इस नाज़ुक पनाहगाह को सिर्फ़ सख़्त क़ाबू में रखकर ही बचाया जा सकता है। मगर जब दबे हुए सवाल इज़्ज़त से जीने की माँग बनने लगते हैं, तो जहाज़ पर छाई ख़ामोशी में भी बदलाव आने लगता है।
यह तकलीफ़, हिम्मत, ज़मीर और एक-दूसरे के साथ खड़े होने की कहानी है। आगे का सफ़र क्या मोड़ लेगा, यह आपको ख़ुद किताब में जानना है।
साल 2150सामाजिक बँटवाराजलवायु पर आधारित कल्पनाकहानी के अंत का राज़ नहीं
बँटी हुई दुनिया के बीच एक सफ़र। जहाज़ को देखिए, उसकी मशीनों की आवाज़ें सुनिए और ऊपरी व निचले डेक की ज़िंदगी की झलक पाइए।
14 TRANSMISSIONS
PRIMARY TRANSMISSION 16:9
रात का सफ़र · खुला समंदर
समंदर में आख़िरी ठिकाना
जहाज़ की बाहरी दीवारों के पार तूफ़ानी अँधेरे में समंदर दूर तक फैला है। यह जहाज़ अपने साथ उम्मीदें और गहराई तक बँटा हुआ समाज लेकर आगे बढ़ता जा रहा है।
जहाज़ को देखिए
13 PORTRAIT TRANSMISSIONS
हर वीडियो इसी जहाज़ के किसी अलग हिस्से की झलक दिखाता है। वीडियो चलाने पर उसकी असली आवाज़ भी सुनी जा सकती है।
आख़िरी ठिकाना / TRANSMISSION 01 / 14
⌁TRANSMISSION
Shipboard observation
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जहाज़ को देखिए
जहाज़ के भीतर की दुनिया।
“आख़िरी ठिकाना” के हर हिस्से को खोलकर देखिए, कमान संभालने वाले सिस्टम और बिजली के कमरों से लेकर उन जगहों तक जहाँ लोग काम करते हैं, आराम करते हैं और मुश्किलों का सामना करते हैं। हर जगह का अपना अलग नज़ारा है।
आख़िरी ठिकाना · जगह 01
जहाज़ पर
कहानी के आगे, असल दुनिया
यह कहानी एक चेतावनी है।
उपन्यास में एक बेहद कठिन भविष्य की कल्पना की गई है। मगर पर्यावरण के ख़तरे और जिस नाइंसाफ़ी के बारे में यह हमें सोचने को कहता है, वे आज की दुनिया के असली सवाल हैं।
एक बेहतर कल अभी भी मुमकिन है
भविष्य हमारे फ़ैसलों पर निर्भर है।
“आख़िरी ठिकाना” में समंदर हमें याद दिलाता है कि इंसानियत क्या कुछ खो सकती है। और जहाज़ के बँटे हुए डेक बताते हैं कि ज़िंदा बचे रहने के बाद भी नाइंसाफ़ी हो सकती है। कहानी का संदेश सिर्फ़ हमें डराकर नहीं रुकता, बल्कि पूछता है कि हम इसका जवाब कैसे देंगे।
जलवायु परिवर्तन या असमानता को कोई एक क़दम ख़त्म नहीं कर सकता। लेकिन विज्ञान, इंसाफ़ पर आधारित नीतियाँ और मिल-जुलकर निभाई गई ज़िम्मेदारी ख़तरे घटा सकती हैं और ज़िंदगियाँ बचा सकती हैं।
कल्पना और हक़ीक़त: किताब में साल 2150 तक धरती के लगभग डूब जाने की स्थिति एक काल्पनिक, भयावह भविष्य की तस्वीर है, वैज्ञानिक भविष्यवाणी नहीं। वास्तविक दुनिया में बढ़ता तापमान, बर्फ़ का कम होना, समुद्र का बढ़ता स्तर और कमज़ोर लोगों पर संकट का ज़्यादा असर वैज्ञानिक तौर पर दर्ज हैं और गंभीर ध्यान माँगते हैं।
साफ़ ऊर्जा, ऊर्जा का बेहतर इस्तेमाल और वैज्ञानिक सबूतों पर आधारित ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन घटाने के प्रयासों का साथ दें।
02
प्रकृति और जीव-जगत की हिफ़ाज़त करें
उजड़े प्राकृतिक ठिकानों को फिर सँवारें, प्रदूषण और कचरा कम करें और भोजन व ज़िंदगी को सहारा देने वाली प्राकृतिक व्यवस्थाओं का सम्मान करें।
03
ज़िंदा रहने के साधनों में इंसाफ़ लाएँ
खाना, साफ़ पानी, इलाज और आपदा की तैयारी तक सभी की पहुँच हो, ख़ास तौर पर उन लोगों की जो पहले से मुश्किल हालात में हैं।
04
मेहनत और मज़दूरों की इज़्ज़त बचाएँ
अच्छे कामकाजी हालात, मज़दूरों की सुरक्षा, सही बर्ताव और उन्हें प्रभावित करने वाले फ़ैसलों में उनकी आवाज़ का समर्थन करें।
05
जानकारी को काम में बदलें
भरोसेमंद स्रोतों से सीखें, अपने आसपास के लोगों के साथ कोशिशें करें और संस्थाओं से ठोस बदलाव के लिए जवाब माँगें।
शहाब ख़ान की तरफ़ से एक निजी संदेश
लेखक की ओर से
एक कहानी, कुछ सवाल और हमारी आने वाली दुनिया
SOS/ PRIORITY TRANSMISSIONSIGNAL LIVE
शहाब ख़ान की तरफ़ से एक निजी संदेश
लेखक की ओर से
एक कहानी, कुछ सवाल और हमारी आने वाली दुनिया
जब मैंने ‘आख़िरी ठिकाना’ लिखने के बारे में सोचा, तो मेरे ज़ेहन में एक सवाल था। अगर हम अपनी धरती और पर्यावरण के प्रति इसी तरह लापरवाह बने रहे, तो आने वाली नस्लों के लिए कैसी दुनिया छोड़कर जाएँगे?
इसी सवाल ने मुझे एक ऐसे भविष्य की कल्पना करने पर मजबूर किया, जहाँ इंसान अपनी तरक़्क़ी और स्वार्थ की क़ीमत चुका रहा है। जहाँ कभी आबाद शहर थे, वहाँ समंदर है। जहाँ कभी हरे-भरे जंगल और ज़िंदगी की रौनक़ हुआ करती थी, वहाँ अब सिर्फ़ गुज़रे हुए वक़्त के निशान बाक़ी हैं।
यह दुनिया मेरी कल्पना है, भविष्य की कोई वैज्ञानिक भविष्यवाणी नहीं। लेकिन जिस ख़तरे से यह कहानी जन्मी है, वह काल्पनिक नहीं है। बढ़ता तापमान, पिघलती बर्फ़, समुद्र का बढ़ता स्तर और बदलता मौसम हमारे आज की हक़ीक़त हैं। हम इनके असर को जितना नज़रअंदाज़ करेंगे, आने वाली पीढ़ियों के लिए मुश्किलें उतनी ही बढ़ती जाएँगी।
लेकिन ‘आख़िरी ठिकाना’ सिर्फ़ पर्यावरण के बिगड़ते हालात की कहानी नहीं है।
इस कहानी का जहाज़ मेरे लिए उस समाज की भी तस्वीर है, जिसमें हम आज जी रहे हैं। एक तरफ़ ऐसे लोग हैं जिनके पास ताक़त, दौलत और तमाम सुविधाएँ हैं। दूसरी तरफ़ वे मज़दूर हैं, जिनकी मेहनत के बिना पूरा जहाज़ एक दिन भी नहीं चल सकता, फिर भी उन्हें अपनी बुनियादी ज़रूरतों और हक़ के लिए जूझना पड़ता है।
मैं इस कहानी के ज़रिए एक और सवाल उठाना चाहता था। अगर कभी इंसान के पास जीने के लिए जगह और ज़रूरत की चीज़ें सीमित रह जाएँ, तो क्या हम उन्हें आपस में इंसाफ़ से बाँट पाएँगे? या उस वक़्त भी अमीरी, ग़रीबी और ताक़त का फ़र्क़ इंसान की ज़िंदगी की क़ीमत तय करेगा?
आना, जेम्स, सारा और रिको जैसे किरदार इसी दुनिया का हिस्सा हैं। वे कोई असाधारण नायक नहीं, बल्कि आम इंसान हैं, जो मुश्किल हालात में अपनी इज़्ज़त, अपने हक़ और एक बेहतर ज़िंदगी की उम्मीद को ज़िंदा रखने की कोशिश करते हैं। उनके संघर्ष में मैंने उस हिम्मत को दिखाने की कोशिश की है, जो ज़ुल्म और नाइंसाफ़ी के सामने भी इंसान को हार मानने नहीं देती।
मेरा मानना है कि किसी समाज की असली पहचान इस बात से होती है कि वह अपने सबसे कमज़ोर लोगों के साथ कैसा बर्ताव करता है। अगर किसी जगह कुछ लोगों के लिए हर सुविधा मौजूद हो, लेकिन दूसरों को दो वक़्त का खाना और साफ़ पानी भी इज़्ज़त से न मिल सके, तो वहाँ सिर्फ़ संसाधनों की नहीं, इंसाफ़ और इंसानियत की भी कमी है।
मैं नहीं चाहता कि आप इस किताब को पढ़कर सिर्फ़ एक डरावने भविष्य की कल्पना करें। मैं चाहता हूँ कि आप आज की दुनिया को भी एक बार नए नज़रिए से देखें।
हमारे पास अभी भी बहुत कुछ बदलने का मौक़ा है। ऊर्जा की बचत करना, प्लास्टिक और प्रदूषण कम करना, प्रकृति की हिफ़ाज़त करना और दूसरों के हक़ के लिए आवाज़ उठाना, ये सभी हमारी ज़िम्मेदारी का हिस्सा हैं। बड़े बदलाव के लिए सरकारों और संस्थाओं को भी ठोस क़दम उठाने होंगे, लेकिन हम अपनी ज़िम्मेदारी से मुँह नहीं मोड़ सकते।
मैं यह कहानी उन सभी लोगों को समर्पित करता हूँ, जो अपनी छोटी-बड़ी कोशिशों से धरती को बचाने, नाइंसाफ़ी के ख़िलाफ़ खड़े होने और दूसरों की ज़िंदगी बेहतर बनाने में लगे हैं।
‘आख़िरी ठिकाना’ एक जहाज़ की कहानी ज़रूर है, लेकिन इसके सवाल उस जहाज़ तक सीमित नहीं हैं। वे हमारी अपनी दुनिया से जुड़े हैं।
मुझे उम्मीद है कि इस किताब में आपको रोमांच भी मिलेगा, कुछ किरदारों से लगाव भी होगा और कुछ ऐसे सवाल भी मिलेंगे, जो आख़िरी पन्ना पढ़ने के बाद आपके साथ रहेंगे।
आइए, इस सफ़र पर मेरे साथ चलिए। एक ऐसी दुनिया की तरफ़, जिसे हमने अपनी कल्पना में खो दिया है, लेकिन अपनी असल दुनिया में अभी बचा सकते हैं।
क्योंकि हमारी धरती का भविष्य सिर्फ़ आने वाला वक़्त तय नहीं करेगा। यह इस बात पर भी निर्भर करेगा कि हम आज क्या करते हैं, किन बातों के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाते हैं और अपनी आने वाली नस्लों के लिए कैसी दुनिया छोड़कर जाना चाहते हैं।
अब यह आप पर है। क्या आप अपने हिस्से की ज़िम्मेदारी लेने के लिए तैयार हैं?
शहाब ख़ान
लेखक, आख़िरी ठिकाना
शहाब ख़ान का उपन्यासआख़िरी ठिकानाएक जहाज़ · दो दुनियाएँ
उपलब्ध संस्करण
कहानी को अपने साथ ले जाइए।
शहाब ख़ान के इस उपन्यास को अपने पसंदीदा रूप में पढ़िए। ख़रीदारी के बटन संबंधित ऑनलाइन स्टोर पर ले जाएँगे।
जहाज़, उसमें रहने वाले लोगों और कहानी से जुड़े असल दुनिया के सवालों को थोड़ा और समझिए, बिना कहानी का कोई राज़ खोले।
⌕
कहानी के पीछे की सोच
शहाब ख़ान
हमारी दुनिया, हमारे फ़ैसले और मुश्किल वक़्त में इंसान बने रहने की कहानी।
“आख़िरी ठिकाना” की कल्पना लेखक के मन में इस सवाल से जन्मी कि अगर हम अपनी धरती और पर्यावरण की उपेक्षा करते रहे, तो आने वाली दुनिया कैसी हो सकती है। जहाज़ सामाजिक असमानता का आईना बन गया, जहाँ ताक़तवर लोग आराम से जी सकते हैं, जबकि इस पूरी व्यवस्था को चलाने वालों से उनकी इज़्ज़त छीन ली जाती है।
इस काल्पनिक सफ़र के ज़रिए उपन्यास पाठकों को उस भविष्य पर सोचने के लिए आमंत्रित करता है जिसे वे बचाना चाहते हैं, और उन लोगों के बारे में भी जिन्हें पीछे नहीं छोड़ा जाना चाहिए।