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गुब्बारे वाला

Shahab KhanBy Shahab Khan·5 min read·August 23, 2026
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Gubbare Wala

मैरिज गार्डन में पार्टी चल रही है। मोहित अपनी पत्नी
सुमन और बेटी स्नेहा के साथ पार्टी में आया था। काफी देर हो चुकी थी, वो वापस जाने
के लिए गार्डन से बाहर निकले। मोहित का मूड कुछ ठीक नहीं है, उसे ऑफिस का कुछ
ज़रूरी काम निपटाना इसलिए वो पार्टी में आना नहीं चाहता था, लेकिन सुमन की ज़िद की
वजह से उसे पार्टी में आना पड़ा।  

गार्डन के बाहर सड़क के दूसरी तरफ़ गुब्बारे बेचने वाला
खड़ा है। मोहित की 6 साल की बेटी स्नेहा की नज़र गुब्बारे वाले पर पड़ी। गुब्बारे
देखते ही उसकी आँखों में चमक आ गई। उसने कहा-

‘‘पापा मुझे गुब्बारा लेना है’’

मोहित ने कहा ‘‘बेटा अब हम घर जा रहे हैं, रात हो गई
है, गुब्बारा लेकर क्या करोगी?’’

स्नेहा ने कहा- ‘‘नहीं पापा, मुझे तो अभी ही चाहिए’’

मोहित कि पत्नि सुमन ने कहा- ‘‘अरे दिला दीजिए न, खुश
हो जाएगी’’

मोहित ने सुमन से कहा- ‘‘अच्छा ठीक है, तुम स्नेहा को
लेकर गाड़ी में जाकर बैठो, मैं गुब्बारा लेकर आता हूँ’’

स्नेहा बोली- ‘‘पापा मुझे भी साथ चलना है’’

मोहित ने सुमन से कहा ‘‘सुमन तुम जाकर गाड़ी में बैठो,
मैं हमारी परी को गुब्बारा दिलाकर लाता हूँ’’ इतना कहकर मोहित स्नेहा को

गोद में लेकर सड़क पार कर गुब्बारे वाले की तरफ़ चल
दिया।

स्नेहा के चेहरे पर मुस्कान आ चुकी है, वो प्यार से
कहती है-

‘‘पापा, यू आर सो स्वीट’’

मोहित प्यार से उसका माथा चूमता है।

सड़क पार करके वो गुबारे वाले के पास पहुंचते हैं।
गुब्बारे वाले के पास अलग-अलग रंग और साइज़ के गुब्बारे हैं।

मोहित स्नेहा से पूछता है- ‘‘बताओ कौन सा गुब्बारा
चाहिए?’’

स्नेहा हाथ से गुब्बारे कि तरफ़ इशारा करके कहती है-
‘‘एक वो यलो कलर का बड़ा वाला और एक वो वाला पिंक कलर का’’

मोहित ने कहा- ‘‘अरे 2 गुब्बारों का क्या करोगी? एक
कोई सा भी ले लो’’

स्नेहा बोली ‘नहीं मुझे तो दोनों ही लेना है’’

गुब्बारे वाला बोला- ‘‘साहब दिला दीजिए, बच्ची खुश हो
जाएगी’’

मोहित का मूड पहले ही खराब था, गुब्बारे वाले की बात
सुनकर उसे गुस्सा आ गया, वो झुँझलाते हुए बोला-

‘‘तुम्हें बच्ची कि खुशी से कोई मतलब नहीं, तुम्हें
सिर्फ़ अपना फ़ायदा नज़र आ रहा है। तुम लोग जानबूझकर पार्टी वाली जगह के बाहर आकर खड़े
हो जाते हो ताकि जब लोग बाहर आयें तो बच्चे गुब्बारे लेने की जिद करें और पेरेंट्स
को दिलाना पड़ें, तुम लोग बहुत ही चालाकी से अपना धंधा चला रहे हो।

मोहित गुस्से में लगातार बोले जा रहा था। फिर थोड़ा
ठहरकर बोला- ‘‘लाओ दोनों गुब्बारे दो’’

गुब्बारे वाला खामोश खड़ा उसकी बात सुन रहा था, वैसे
भी समाज में ग़रीब को जवाब देने का अधिकार नहीं होता। उसने दोनों गुब्बारे स्नेहा
के हाथ में पकड़ा दिए। दोनों गुब्बारे पाकर स्नेहा के चेहरे पर मुस्कान आ गई। उसने
गुब्बारे वाले से कहा- ‘‘थैंक यू अंकल’’

गुब्बारे वाला जवाब में हल्का सा मुस्कुराया, उसकी
मुस्कान में एक उदासी थी।

मोहित ने स्नेहा से कहा- ‘‘अब खुश’’

जवाब में स्नेहा ने हँसते
हुए हाँ में सर हिलाया। गुब्बारे वाला खामोशी से उन्हें देख रहा था।

‘‘क्या करें साहब हमारी भी मजबूरी है, आप लोगों के बच्चे खेलते हैं, तब हमारे बच्चे खाते हैं, हमारे बच्चों को पेट भर खाना मिल जाए उससे बड़ी खुशी उन्हें कभी नसीब ही नहीं होती’’

मोहित गुब्बारे वाले से बोला- ‘‘खुश तो तुम भी होगे,
एक के बजाए 2 गुब्बारे जो बेच दिए। तुम जैसे लोगों को यहाँ खड़े होने ही नहीं देना
चाहिए’’

इतनी देर से खामोशी से मोहित की बातें सुन रहा
गुब्बारे वाला थोड़ी हिम्मत करके बोला-

‘‘क्या करें साहब हमारी भी मजबूरी है, आप लोगों के
बच्चे खेलते हैं, तब हमारे बच्चे खाते हैं, हमारे बच्चों को पेट भर खाना मिल जाए
उससे बड़ी खुशी उन्हें कभी नसीब ही नहीं होती’’

गुब्बारे वाले की बात ने मोहित को अंदर तक झँझोड़
दिया। उसका गुस्सा और झुंझलाहट एक पल में ही खत्म हो गई। उसे अपनी ग़लती का एहसास
हो रहा था, उसने गुब्बारे वाले के साथ जो बर्ताव किया उसके लिए खुद को शर्मिंदा
महसूस कर रहा था। उसमे इतनी हिम्मत नहीं थी कि वो अपनी ग़लती के लिए गुब्बारे वाले
से सॉरी कह सके, वैसे भी हमारे समाज में अमीर आदमी अपनी ग़लती कुबूल करके ग़रीब से सॉरी कहे ये रिवाज
अभी तक शुरू नहीं हुआ है। 

रोहित निशब्द था।

गुब्बारा वाला खामोशी से उन्हें देख रहा था। मोहित
उससे नज़रें नहीं मिला पा रहा था। उसने सिर्फ़ इतना पूछा- ‘‘कितने पैसे हुए?’’

गुब्बारे वाले ने कहा- ‘‘30 रुपये’’

मोहित ने पर्स से पैसे निकालकर गुब्बारे वाले को दिए
और वापस जाने के लिए मुड़ा। स्नेहा ने मुस्कराते हुए मासूमियत से गुब्बारे वाले को
हाथ हिलाकर कहा-‘‘बाय अंकल’’

गुब्बारे वाले ने जवाब में मुस्कुराकर हाथ हिलाया।

हमारे समाज में अमीर आदमी अपनी ग़लती कुबूल करके ग़रीब से सॉरी कहे ये रिवाज अभी तक शुरू नहीं हुआ है।

मोहित स्नेहा को गोद में लिए गाड़ी की तरफ़ बड़ चला।
स्नेहा बोली-‘‘पापा वो गुब्बारे वाले अंकल के पास इतने सारे गुब्बारे हैं, अगर वो
सारे नहीं बिके तो वो क्या उन्हें वापस अपने घर ले जाएंगे?’’

मोहित ने जवाब में कहा- ‘‘हाँ बेटा’’

स्नेहा मासूमियत से बोली- ‘‘वाउ, उनके बच्चे कितने
लकी हैं, आज उनके पास खेलने के लिए इतने सारे गुब्बारे होंगे, है न पापा?’’

स्नेहा के मासूमियत भरे सवाल का मोहित के पास कोई
जवाब नहीं था। गुब्बारे वाले के शब्द उसके कानों में गूंज रहे थे-

‘‘आप लोगों के बच्चे खेलते हैं तब हमारे बच्चे खाते
हैं’’

वो बिना कुछ कहे चुपचाप गाड़ी की तरफ़ बड़ रहा था।

समाप्त 

शहाब ख़ान 'सिफ़र'