
उर्दू रस्म-उल-ख़त का सफ़र: सेमिटिक से नस्तालीक़ तक – सिफ़र
उर्दू लिखावट की बुनियाद सेमिटिक (Semitic) ख़त में है। सेमिटिक ज़बानों की ख़ास बात ये है कि इनमें सिर्फ़ हर्फ़-ए-सहीह (consonants) लिखे जाते हैं, हर्फ़-ए-इल्लत (vowels) छोड़ दिए जाते हैं। अरबी ख़त की जड़ें आरामी (Aramaic) और नब्ती (Nabataean) ख़तों में मिलती हैं। नब्ती को अरबी ख़त का वालिद माना जाता है, जो असल में आरामी की एक शाख़ थी।
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ग़ज़ा की टूटी दीवारों के पीछे बच्चों की बेबस मुस्कानें – शहाब ख़ान
ग़ज़ा की जो तस्वीरें हमें दिखती हैं, वो सिर्फ़ मलबा हैं। मगर उस मलबे के पीछे एक पूरी दुनिया है। वहाँ बच्चे कंक्रीट के टुकड़ों के बीच अपनी गुड़िया ढूँढते हैं। वहाँ बच्चियाँ अपनी कॉपियाँ समेटती हैं, ताकि कल स्कूल जा सकें, अगर स्कूल बचा हो। वहाँ बच्चे तंबू के अंदर बैठकर अपने दोस्तों के नाम याद करते हैं, जो अब नहीं हैं।

मैंने ‘ग़ज़ा डायरी’ क्यों लिखी: एक क़लम की कहानी, मेरे ज़मीर की आवाज़
कुछ किताबें लिखी नहीं जातीं, वो ख़ुद को लिखवा लेती हैं। "ग़ज़ा डायरी" मेरे लिए वही किताब है। ये कहानी किसी मेज़ पर बैठकर तराशी हुई चीज़ नहीं, ये उस दर्द से निकली है जो महीनों तक सीने में चुभता रहा, जो रातों को सुलाता नहीं था। जब मैं फ़िलिसतीन के लोगों, मासूम बच्चों पर जुल्म की इंतिहां देखता तो दिल तड़प उठता था। जब मैंने मासूम हिंद रजब के क़त्ल की तफ़सील पढ़ी, तो लगा जैसे किसी ने अंदर ही अंदर कुछ तोड़ दिया हो। उसके बाद जो लिखा गया, वो सिर्फ़ कहानी नहीं, एक ज़िम्मेदारी बन गई।

नुक़्ता लगाने का शौक़: जब उर्दू के सादे लफ़्ज़ ‘ख़ूबसूरत’ बनाने की कोशिश में मायने ही बिगड़ जाए
कई लोग ये समझते हैं कि उर्दू लिखने का असल फ़न तो नुक़्ते लगाने में है। खासतौर पर ग़ैर मुस्लिम जिन्हें उर्दू पसंद है लेकिन बुनियादी उसूल मालूम न होने की वजह से अक्सर उर्दू लफ़्ज़ को देवनागरी और रोमन में लिखने और बोलने में ग़लती हो जाती है।

उर्दू रस्म-उल-ख़त का सफ़र: सेमिटिक से नस्तालीक़ तक – सिफ़र
उर्दू लिखावट की बुनियाद सेमिटिक (Semitic) ख़त में है। सेमिटिक ज़बानों की ख़ास बात ये है कि इनमें सिर्फ़ हर्फ़-ए-सहीह (consonants) लिखे जाते हैं, हर्फ़-ए-इल्लत (vowels) छोड़ दिए जाते हैं। अरबी ख़त की जड़ें आरामी (Aramaic) और नब्ती (Nabataean) ख़तों में मिलती हैं। नब्ती को अरबी ख़त का वालिद माना जाता है, जो असल में आरामी की एक शाख़ थी।

रुपया, डॉलर, अर्थव्यवस्था और राजनीति (व्यंग्य)
मेरी बात सुनकर रुपये के चेहरे की उदासी बढ़ गई। पहले उसने आसमान की तरफ देखा और फिर मुझसे नज़रें मिलते हुए कहने लगा मैं बढ़ती महंगाई के बोझ से दबा जा रहा हूँ, मुद्रास्फीति (Inflation) बढ़ने के कारण मेरी हालत पहले जैसी नहीं रही, डॉलर के मुक़ाबले में कमज़ोर होता जा रहा हूँ, डॉलर के मुक़ाबले में मेरी इतनी ख़राब स्थिति कभी नहीं हुई। नोटबंदी के बाद तो मेरी कमर ही टूट गई है। ये कहते कहते रुपये का चेहरा रुंआसा सा हो गया।

निंदा आयोग – व्यंग्य
राजनीति में निंदा की परम्परा सदियों से चली आ रही है। राजनेताओं द्वारा एक दूसरे की निंदा करना (कीचड उछालना) जन्मसिद्ध अधिकार जैसा है। कभी एक राजनेता दूसरे पर किसी घटना की निंदा न करने पर उस राजनेता की निंदा करते है तो कभी किसी बात पर अनावश्यक निंदा करने पर निंदा करते हैं। राजनीती को निंदा ने हर तरफ से ऐसे घेर रखा है जैसे हमें हर तरफ से हवा ने घेरा हुआ है।

गधों की सभा (व्यंग्य)
एक घने जंगल के बीचोबीच एक छोटा-सा मैदान था। वहां एक अजीब-सी हलचल मची थी। गधों का एक बड़ा झुंड जमा था, और माहौल कुछ उत्सव जैसा था। खबर आई थी कि गधों की एक “महासभा” बुलाई गई है, और इस सभा में कुछ बेहद अहम फैसले लिए जाएंगे। सभा का आयोजन ‘गदाधर’ नामक अनुभवी गधे ने किया था, जिसे जंगल के सभी गधों का लीडर माना जाता था।

‘दवा-दारू’ एक आम फ़हम लफ़्ज़ की सही पहचान
असल में "दारू" का रिश्ता फ़ारसी ज़ुबान से है, और इसका मतलब दवा होता है। जब हम "दवा-दारू" कहते हैं, तो इसका मतलब होता है बीमारी का इलाज या किसी मर्ज़ को ठीक करने के लिए अपनाए गए तरीक़े। यानी, इसमें न तो शराब का कोई तसव्वुर है और न ही इसका शराब से कोई ताल्लुक़। ये पूरी तरह से सेहत और इलाज से जुड़ा एक मुहावरा है।
