मैंने ‘ग़ज़ा डायरी’ क्यों लिखी: एक क़लम की कहानी, मेरे ज़मीर की आवाज़

कुछ किताबें लिखी नहीं
जातीं, वो ख़ुद को लिखवा लेती हैं। "ग़ज़ा
डायरी" मेरे लिए वही किताब है। ये कहानी किसी मेज़ पर बैठकर तराशी हुई चीज़
नहीं, ये उस दर्द से निकली है जो महीनों तक सीने में चुभता
रहा, जो रातों को सुलाता नहीं था। जब मैं फ़िलिसतीन के लोगों,
मासूम बच्चों पर जुल्म की इंतिहां देखता तो दिल तड़प उठता था। जब मैंने मासूम हिंद रजब
के क़त्ल की तफ़सील पढ़ी, तो लगा जैसे किसी ने अंदर ही अंदर
कुछ तोड़ दिया हो। उसके बाद जो लिखा गया, वो सिर्फ़ कहानी
नहीं, एक ज़िम्मेदारी बन गई।
यह कहानी सिर्फ़ लफ़्ज़ों
का मजमूआ नहीं, बल्कि उन हक़ीक़तों की
आवाज़ है जो फ़िलिस्तीन में चल रहे ज़ुल्म, नाइंसाफ़ी और
इंसानी तकलीफ़ के ख़िलाफ़ दहाड़ती है। मेरे दिल की गहराइयों से निकली ये दास्तान
उन मासूम बच्चों की कहानी है, जिनकी बेगुनाही की क़ीमत आज
चुकाई जा रही है। जब मैं उन मासूम चेहरों को याद करता हूँ, जिनकी
हँसी को बमों ने चुरा लिया, तो मेरा दिल टूट जाता है।
“यह कहानी सिर्फ़ लफ़्ज़ों
का मजमूआ नहीं, बल्कि उन हक़ीक़तों की
आवाज़ है जो फ़िलिस्तीन में चल रहे ज़ुल्म, नाइंसाफ़ी और
इंसानी तकलीफ़ के ख़िलाफ़ दहाड़ती है।
"ग़ज़ा डायरी"
में ग़ज़ा कोई बैकग्राउंड नहीं है। ये कहानी का हिस्सा है, उसकी
रूह है। मैंने जब इस किताब की बुनियाद रखी, तो सबसे पहले ये
समझा कि ग़ज़ा सिर्फ़ एक जगह का नाम नहीं, बल्कि वो माहौल है
जहाँ मरियम और उसका परिवार साँस लेता है, जूझता है, और हर रोज़ कुछ नया खोता है।
ग़ज़ा की तारीख़ सिर्फ़
हेडलाइन में नहीं पढ़ी जा सकती। वहाँ के लोगों की ज़िंदगी में जंग, शनाख़्त, ज़मीन और
इंसानी हुक़ूक़ की जो कहानी है, वो किसी अख़बार के पन्ने पर
नहीं समाती। मैंने ये किताब इसलिए लिखी कि ये सब सिर्फ़ आँकड़े बनकर न रह जाए। जब
कोई कहता है "बच्चे मारे गए", तो उसके पीछे जो माँ
का आँचल ख़ाली हो जाता है, जो बाप की आँखें सूख जाती हैं,
वो किसी स्टैटिस्टिक्स में नहीं दिखता। मैं उसी को दिखाना चाहता था।
कहानी जो हेडलाइन से निकली -हिंद रजब की शहादत
हिंद रजब। पाँच साल की एक
बच्ची। 29 जनवरी 2024 की वो
सुबह, जब वो अपने परिवार के साथ ग़ज़ा सिटी से निकल रही थी,
तभी उनकी गाड़ी पर गोलियाँ बरसीं। हिंद बच गई, मगर गाड़ी के अंदर फँस गई, अपने परिवार के मुर्दा जिस्मों
के बीच। उसने फ़लस्तीनी रेड क्रिसेंट सोसाइटी को फ़ोन किया, मदद
के लिए गुहार लगाई। घंटों वो गाड़ी में फँसी रही। जो दो पैरामेडिक्स उसे बचाने गए,
वो भी शहीद हो गए। बारह दिन बाद सबकी लाशें मिलीं।
ये सिर्फ़ एक वाक़या नहीं
है। ये वो चिंगारी थी जिसने मुझे लिखने पर मजबूर किया। मैंने सोचा, अगर मैं चुप रहूँगा, तो
क्या फ़र्क़ पड़ेगा? कुछ नहीं। मगर अगर मैं लिखूँ, तो शायद कोई एक शख़्स भी इस कहानी को पढ़कर ठहर जाए, सोचे। यही काफ़ी है।
हिंद रजब की याद हमें ये
सिखाती है कि जब भी इंसानियत पर वार होता है, तो हमें अपनी आवाज़ उठाना लाज़िमी है। उसकी मासूमियत, उसकी बेबसी, और उसकी मौत, ये
सब हमारे ज़मीर पर एक ऐसा दाग़ है जो कभी नहीं मिटेगा।
ये किताब क्या है और क्या नहीं?
यहाँ एक बात साफ़ कर देना
ज़रूरी है। "ग़ज़ा डायरी" कोई अख़बारी रिपोर्ट नहीं है। ये एक फ़िक्शन है, एक ऐसी कहानी जिसकी जड़ें असल वाक़ियात में
हैं, मगर जिसे इमोशनल आज़ादी के साथ तराशा गया है। मरियम,
उसकी डायरी, उसका परिवार, ये सब कहानी के किरदार हैं, मगर उनके दर्द की जड़
असली है। मैंने महीनों तक फ़लस्तीन की ख़बरें पढ़ीं, रिपोर्ट्स
खंगालीं, लोगों की कहानियाँ सुनीं। फिर उन्हें मरियम की
डायरी के ज़रिए एक इंसानी शक्ल दी।
मेरा मक़सद ये नहीं था कि
मैं कोई तहक़ीक़ी किताब लिखूँ। मेरा मक़सद था कि जो दर्द हेडलाइन में सिमट जाता है, वो किसी के दिल तक पहुँचे। इस कहानी को
लिखने का मक़सद है उन दबी हुई सच्चाइयों को उजागर करना, जो
अक्सर अनसुनी रह जाती हैं।
इस किताब में कई परतें
हैं। बच्चे, जो इस जंग के सबसे
बड़े शिकार हैं, जिनकी मौतें, ज़ख़्म,
डर और बेघरी इस पूरे मसले का सबसे दर्दनाक पहलू है। बेघरी, जिन परिवारों को बार-बार अपने घर छोड़ने पड़े, जो
कैंपों और स्कूलों में पनाह लेने पर मजबूर हुए। खाना और बुनियादी ज़रूरतें,
जहाँ रोटी, पानी, दवा सब
कुछ एक ख़्वाब बन गया। और सेहत, जहाँ अस्पताल ख़ुद मलबे में
तब्दील हो गए, और डॉक्टर, नर्स,
मरीज़ सब ख़तरे में जी रहे हैं।
मैंने ये सब किरदारों की
ज़ुबान से लिखा। मरियम की डायरी के ज़रिए। ताकि पढ़ने वाला ये न समझे कि वो कोई
ख़बर पढ़ रहा है, बल्कि ये
महसूस करे कि वो किसी की ज़िंदगी में झाँक रहा है।
इस किताब के पन्नों में बस
दर्द ही नहीं, बल्कि एक पैग़ाम भी
है। जद्दोजहद में भी, मायूसी में भी, ख़्वाब
की रोशनी क़ायम रहती है। फ़िलिस्तीन की मिट्टी, ग़ज़ा की टूटी
हुई दीवारें, और वहाँ के बच्चों की बेबस मुस्कानें, ये सभी एक साथ मिलकर उस आवाज़ का हिस्सा हैं जो दुनिया को बताती है कि
इंसानियत की हिम्मत की कोई हद नहीं होती।
The Wire Hindi - ग़ज़ा डायरी: एक ज़िंदा दस्तावेज़ है रोज़मर्रा की जंग लड़ते लोगों और मासूम बच्चों की↗
आपसे एक दरख़्वास्त, सिर्फ़ पढ़ें नहीं, महसूस करें
इन दर्दनाक माहौल के बीच, मैं आप सभी से ये अपील करता हूँ कि आप इन
कहानियों को सिर्फ़ पढ़ें ही नहीं, बल्कि महसूस भी करें। आइए,
हम सब मिलकर उन मासूमों के लिए आवाज़ उठाएँ, जिनकी
क़ुर्बानियों को सदा याद रखा जाना चाहिए। आपकी हर एक आवाज़, आपका
हर एक क़दम उन बच्चों के लिए इंसाफ़ और आज़ादी की नई उम्मीद जगाने में मदद कर सकता
है।
इस कहानी में छुपे हर दर्द, हर आह को महसूस करें और फ़िलिस्तीन में हो
रहे ज़ुल्म के ख़िलाफ़ अपनी हमदर्दी और यकजहती का पैग़ाम फैलाएँ। आपकी आवाज़ उन
मासूम दिलों के लिए रोशनी बन सकती है, जो अंधेरे में डूब
चुके हैं।
आपसे एक दरख़्वास्त है, इन कहानियों को सिर्फ़ किताब तक महदूद न
रहने दें। अगर इस किताब ने आपके दिल को छुआ है, तो इसे और
लोगों तक पहुँचाएँ। इसे हर बच्चे को सुनाएँ, जिसने शायद
उम्मीद खो दी हो, या उस दोस्त को बताइए जिसने अपने ग़मों में
हिम्मत ढूँढ़ी हो। सोशल मीडिया पर अपनी राय साझा करें, मुबाहिसा
करें, ताकि दुनिया में हर बच्चे और बड़े तक इन कहानियों की
सच्चाई पहुँच सके।
और सबसे ज़रूरी बात, ख़ामोश न रहें। आप जहाँ हैं, जिस फ़ील्ड में हैं, फ़िलिस्तीन की आज़ादी के लिए
आवाज़ उठाते रहें। ज़ायोनिस्ट प्रोपेगेंडा को बेनक़ाब करने के लिए पूरी दुनिया में
जो लोग आवाज़ उठा रहे हैं, चाहे वो जुलूस-रैलियों के ज़रिए,
आर्टिकल के ज़रिए, सोशल मीडिया के ज़रिए,
उनका साथ दें।
मैंने ये किताब क्यों लिखी, एक आख़िरी बात
मैंने ये किताब इसलिए लिखी
क्योंकि मैं चुप नहीं रह सका। मैंने ये किताब इसलिए लिखी क्योंकि जब हिंद रजब ने
मदद के लिए फ़ोन किया था, तो दुनिया
ने सुना, मगर जवाब नहीं दिया। मैंने ये किताब इसलिए लिखी
क्योंकि मुझे लगा कि अगर मैं एक भी इंसान को इस कहानी से जोड़ सका, तो शायद वो आँकड़ों की जगह चेहरे देखेगा, हेडलाइन की
जगह ज़िंदगियाँ देखेगा।
ये किताब किसी को बदलने के
लिए नहीं है। ये सिर्फ़ याद दिलाने के लिए है कि जंग सिर्फ़ ज़मीन का नहीं, इंसानियत का भी होता है। और जब तक कोई एक
बच्चा अपने परिवार के जिस्मों के बीच फँसा हुआ मदद के लिए फ़ोन करता है, तब तक हम चुप नहीं बैठ सकते।
मैंने लिखा, क्योंकि मुझे लिखना था। और शायद आपको पढ़ना
चाहिए, क्योंकि ये कहानी सिर्फ़ मेरी नहीं, उन सबकी है जो ग़ज़ा में हैं, जो अब नहीं हैं,
और जो कल भी रहेंगे। अपनी ज़मीन, अपनी शनाख़्त,
अपने हुक़ूक़ के लिए।
Shahab KhanAuthor & Storyteller

