नुक़्ता लगाने का शौक़: जब उर्दू के सादे लफ़्ज़ ‘ख़ूबसूरत’ बनाने की कोशिश में मायने ही बिगड़ जाए

हमारे यहाँ एक बहुत आम सी बात है, जिस पर शायद ही किसी ने ग़ौर किया हो। कई लोग ये समझते हैं कि उर्दू लिखने का असल फ़न तो नुक़्ते लगाने में है। खासतौर पर वो लोग जिन्हें उर्दू पसंद है और वो उसे हिन्दी/English (देवनागरी/रोमन) में लिखते, लेकिन बुनियादी उसूल मालूम न होने की वजह से अक्सर उर्दू लफ़्ज़ को देवनागरी और रोमन में लिखने और बोलने में ग़लती हो जाती है।
अक्सर लोगों को लगता है जिस लफ़्ज़ में जितने ज़्यादा नुक़्ते, उतनी ही उसकी उर्दू ज़्यादा पक्की। ये एक ऐसी ग़लत-फ़हमी है जो न सिर्फ़ नए लिखने वालों में है, बल्कि कई पुराने क़लमकारों में भी देखने को मिलती है। नतीजा ये कि अक्सर उर्दू को देवनागरी में लिखने और बोलने में भी वो ऐसी जगहों पर नुक़्ते लगा देते हैं जहाँ नुक़्ते का कोई काम नहीं होता।
नुक़्ता क्या है और कहाँ लगता है?
इससे पहले कि हम ग़लतियों पर बात करें, ये समझ लेना ज़रूरी है कि ‘नुक़्ता’ असल में क्या है। नुक़्ता अरबी ज़बान का लफ़्ज़ है जिसका मतलब है 'मरकज़' या 'निशान'। उर्दू और अरबी रस्म-उल-ख़त में नुक़्ते का वाहिद मक़सद ये है कि एक जैसी शक्ल रखने वाले हर्फ़ों में फ़र्क़ किया जा सके। जैसे 'ب ब' और 'پ प' में सिर्फ़ नुक़्ते का फ़र्क़ है, 'ج ज' और 'چ च' में भी यही मामला है। यानी नुक़्ता दरअसल एक इम्तियाज़ी निशान है, न कि कोई हुस्न-ए-लफ़्ज़ का ज़रिया।
उर्दू में नुक़्ता सिर्फ़ उन हर्फ़ों पर लगता है जो अरबी, फ़ारसी या अंग्रेज़ी से आए हैं। हिंदी या संस्कृत के असल अलफ़ाज़ में नुक़्ता नहीं लगता क्योंकि उन ज़बानों में वो आवाज़ें मौजूद ही नहीं थीं। यही बुनियादी उसूल है जिसे समझने में लोग सबसे ज़्यादा ग़लती करते हैं।
कुछ मज़ाहिया मगर दर्दनाक मिसालें
सबसे ज़्यादा ग़लतियाँ ‘ج ज’ ‘ز ज़’ में फ़र्क़ न कर पाने की हैं।
अब ज़रा इन मिसालों को देखिए जो हमारे हाँ आम हैं:
रिवाज को रिवाज़ लिखना। यहाँ ‘ج ज ’ को ‘ز ज़’ लिख देते हैं। यहाँ लफ़्ज़ ‘रिवाज’ अरबी से आया है और इसमें 'ज' पर नुक़्ता नहीं लगता।
मौजूद को मौज़ूद लिखना। यहाँ लफ़्ज़ 'मौजूद' अरबी से आया है और इसमें 'ज' पर नुक़्ता नहीं लगता। लेकिन चूँकि 'ज' का नुक़्ता नज़र आता है, तो लोग 'ज़' का नुक़्ता भी लगा देते हैं। नतीजा ये कि लफ़्ज़ अरबी से फ़ारसी होता हुआ कहीं और ही पहुँच जाता है।
वजूद को वज़ूद लिखना। यही कहानी। 'ज' के नीचे का नुक़्ता 'ज़' का नुक़्ता बन जाता है और लफ़्ज़ अपना वक़ार खो देता है।
ये सिर्फ़ चंद मिसालें हैं। इसके अलावा भी सैकड़ों अलफ़ाज़ हैं जिनमें लोग नुक़्ते का इस्तेमाल ऐसे करते हैं जैसे ये कोई ज़ेवर हो जिसे हर लफ़्ज़ पर पहना देना ज़रूरी है।
अब सवाल ये है कि आख़िर ये लोग ऐसा क्यों करते हैं? इसकी कुछ वजहें हैं:
पहली वजह - अधूरी तालीम: उर्दू की तालीम का मेयार कई जगह बहुत कमज़ोर है। बच्चों को इमला के बुनियादी उसूल नहीं सिखाए जाते। इसलिए वो सिर्फ़ देखा-देखी नुक़्ते लगाते हैं। जहाँ कहीं हर्फ़ की शक्ल देखी, वहाँ नुक़्ता लगा दिया। 'ज' का नुक़्ता किसी और के सर पर लगा दिया, 'ज़' का नुक़्ता किसी और के पैरों में।
दूसरी वजह - फ़ारसी और अरबी का फ़र्क़ न जानना: बहुत से लोगों को ये मालूम ही नहीं कि उर्दू के अलफ़ाज़ मुख़्तलिफ़ ज़बानों से आए हैं। वो ये समझते हैं कि तमाम उर्दू अलफ़ाज़ एक ही जिंस के हैं और सब में एक जैसा उसूल चलेगा। हालाँकि अरबी के 'स' और फ़ारसी के 'स' में बहुत फ़र्क़ होता है।
तीसरी वजह - कंप्यूटर और यूनिकोड का असर: आज कल लोग उर्दू यूनिकोड में लिखते हैं। यूनिकोड की-बोर्ड में हर हर्फ़ का अलग कोड है। अगर आप 'ज' को 'ज़' समझ कर टाइप कर दें तो कंप्यूटर उसे 'ज़' ही लिखेगा। इस तरह एक नुक़्ते की ग़लती पूरे लफ़्ज़ को बिगाड़ देती है। और चूँकि लोग टाइप करते वक़्त जल्दी में होते हैं, इसलिए ग़लतियाँ आम हो गई हैं।
चौथी वजह - सोशल मीडिया और इश्तिहारात का असर: सोशल मीडिया पर लोग उर्दू में कैप्शन लिखते हैं और उनमें कई ग़लतियाँ होती हैं। ये ग़लतियाँ देखने वालों को दुरुस्त लगने लगती हैं। एक तहक़ीक़ के मुताबिक़ सोशल मीडिया पर ग़लत उर्दू इमला का इस्तेमाल आम हो गया है और अगर ये सिलसिला जारी रहा तो लोग ग़लत को ही दुरुस्त मानने लगेंगे। ये बात इंतिहाई तशवीशनाक है।
पाँचवीं वजह - 'ट्रेंड' की पैरवी: बहुत से लोग ये देख कर नुक़्ते लगाते हैं कि कोई और भी ऐसा लिख रहा है। वो ये नहीं सोचते कि दुरुस्त क्या है, बस ये देखते हैं कि चलन क्या है। अगर किसी ने एक बार ग़लत लिख दिया और दस लोगों ने देख लिया, तो दस लोग यही समझ बैठते हैं कि यही दुरुस्त है।
इसका नुक़सान क्या है?
ये सिर्फ़ एक मासूम सी ग़लती नहीं है। इसके कई नुक़सानात हैं:
मअनी बदल जाते हैं: उर्दू में एक नुक़्ते का फ़र्क़ पूरे मअनी बदल देता है। 'सज़ा' और 'सजा' में एक नुक़्ते का फ़र्क़ है, एक का मतलब सज़ा है और दूसरे का सजावट। अगर आप 'सज़ा' को 'सजा' लिख दें तो बात कहीं से कहीं पहुँच जाएगी।
मुताला मुश्किल हो जाता है: जब किसी मतन में ग़लत नुक़्ते हों तो पढ़ने वाला उलझन का शिकार हो जाता है। उसे समझ नहीं आता कि मुसन्निफ़ क्या कहना चाह रहा है।
ज़बान की साख़ ख़राब होती है: अगर उर्दू में इस तरह ग़लतियाँ आम हो जाएँ तो न सिर्फ़ उर्दू की ख़ूबसूरती ख़त्म होगी बल्कि नई नस्ल इस ज़बान को सीखने में हिचकिचाहट महसूस करेगी।
पहचान का मसला: उर्दू हमारी तहज़ीब और पहचान का हिस्सा है। अगर हम इसकी इमला को ही बिगाड़ देंगे तो आने वाली नस्लें क्या सीखेंगी?
“"हर लफ़्ज़ में नुक़्ता नहीं लगता। कुछ लफ़्ज़ ऐसे ही मुकम्मल होते हैं।"
Culture · Educationउर्दू रस्म-उल-ख़त का सफ़र: सेमिटिक से नस्तालीक़ तक – सिफ़र↗अब सबसे अहम सवाल इसका इलाज क्या है?
बुनियादी इमला सीखें: सबसे पहले तो ये समझें कि हर लफ़्ज़ में नुक़्ता नहीं लगता। अरबी, फ़ारसी, हिंदी और संस्कृत के अलफ़ाज़ में नुक़्ते का उसूल अलग-अलग है। जिस लफ़्ज़ की जड़ जिस ज़बान में है, उसी के मुताबिक़ उसका इमला होगा।
लुग़त देखने की आदत डालें: कोई लफ़्ज़ लिखते वक़्त शक़ हो तो लुग़त (dictionary) देख लें। फ़ारसी-उर्दू लुग़त या मौलवी सैयद अहमद देहलवी साहब की किताब 'फ़रहंग-ए-आसफ़िया' इसके लिए बहुत बेहतरीन है। इस किताब की 4 जिल्द (Volume) हैं। ये किताब 'रेख़्ता' वेबसाईट पर फ्री अवेलेबल हैं। वहाँ इनका मुताल'अ किया जा सकता है।
बहुत से मोबाइल ऐप्स भी हैं जिनमें आप लफ़्ज़ टाइप करें और सही इमला देख सकते हैं।
अच्छे लिखने वालों को पढ़ें: जो लोग उर्दू को ठीक से लिखते हैं, उन्हें पढ़ें। उनकी किताबें, उनके मक़ाले, उनके अख़बार इनसे इमला अपने आप दुरुस्त होता जाएगा।
टाइप करते वक़्त जल्दबाज़ी न करें: यूनिकोड में टाइप करते वक़्त ज़रा ठहर कर सोचें कि जो हर्फ़ टाइप कर रहे हैं वो सही है या नहीं। एक सेकंड की सोच पूरे लफ़्ज़ को बचा सकती है।
सोशल मीडिया पर इमला की फ़िक्र करें: अगर आप सोशल मीडिया पर उर्दू में लिखते हैं तो अपनी इमला पर ध्यान दें। आपका एक दुरुस्त लिखा लफ़्ज़ दस लोगों को सिखा सकता है।
बच्चों को सिखाएँ: अपने घर के बच्चों को उर्दू की बुनियादी इमला सिखाएँ। उन्हें बताएँ कि कौन सा लफ़्ज़ किस ज़बान से आया है और उसमें नुक़्ते का क्या उसूल है। यही असली सदक़ा है जो आप उर्दू को दे सकते हैं।
आख़िरी बात नुक़्ता उर्दू की जान है, मगर शर्त ये है कि वो सही जगह लगे। ग़लत जगह लगा नुक़्ता ज़बान को सँवारता नहीं, बिगाड़ता है। उर्दू वो ज़बान है जिसने फ़ारसी, अरबी, तुर्की और हिंदुस्तान की मिट्टी की ख़ुशबू को अपने अंदर समेटा है। इसकी इमला भी उसी तरह मुख़्तलिफ़ रंगों का मेल है।
तो अगली बार जब आप उर्दू में कुछ लिखें, तो ज़रा ठहर कर सोचें, इस लफ़्ज़ में नुक़्ता लगेगा या नहीं? क्योंकि ज़बान की ख़ूबसूरती उसकी इमला में ही छुपी होती है। और जो लोग नुक़्तों को ज़ेवर समझ कर हर लफ़्ज़ पर लगा देते हैं, वो असल में ज़ेवर नहीं, ज़ख़्म लगाते हैं।
Shahab KhanAuthor & Storyteller

