ग़ज़ा की टूटी दीवारों के पीछे बच्चों की बेबस मुस्कानें – शहाब ख़ान

ज़रा तसव्वुर कीजिए। एक ऐसी जगह जहाँ हर बच्चे की सुबह इस सवाल से शुरू होती है कि आज शाम तक वो ज़िंदा रहेगा या नहीं। जहाँ खेल का मतलब पत्थरों से खेलना है, और हँसी का मतलब ये भूल जाना है कि कल क्या हुआ था। ये कोई कहानी नहीं, ये ग़ज़ा है। और यहाँ के बच्चे वो मासूम हैं जिनकी मुस्कान आज भी ज़िंदा है, मगर बेबस है।
ग़ज़ा में बच्चों की उमर का
हिसाब वहाँ की तारीख़ से नहीं लगाया जा सकता। वहाँ कोई पाँच साल का नहीं होता, कोई दस साल का नहीं होता। वहाँ बच्चे एक
जंग को जीते हैं, फिर दूसरे को, फिर
तीसरे को। पाँच साल की उमर में उन्हें ये पता होता है कि ड्रोन की आवाज़ और बम की
आवाज़ में क्या फ़र्क़ है। दस साल की उमर में उन्हें ये याद होता है कि पिछली बार
उनका घर कब उड़ा था। और पंद्रह साल की उमर में उनकी आँखों में वो थकान होती है जो
किसी बुज़ुर्ग की आँखों में भी नहीं होनी चाहिए।
ये बच्चे बड़े नहीं हो रहे, ये सिर्फ़ बच जा रहे हैं। और जो बच जाते
हैं, उनके सर पर वो बोझ होता है जिसे उठाना किसी इंसान के बस
की बात नहीं।
“ये बच्चे बड़े नहीं हो रहे, ये सिर्फ़ बच जा रहे हैं। और जो बच जाते हैं, उनके सर पर वो बोझ होता है जिसे उठाना किसी इंसान के बस की बात नहीं।
टूटी दीवारों के पीछे की दुनिया
ग़ज़ा की जो तस्वीरें हमें
दिखती हैं, वो सिर्फ़ मलबा हैं।
मगर उस मलबे के पीछे एक पूरी दुनिया है। वहाँ बच्चे कंक्रीट के टुकड़ों के बीच
अपनी गुड़िया ढूँढते हैं। वहाँ बच्चियाँ अपनी कॉपियाँ समेटती हैं, ताकि कल स्कूल जा सकें, अगर स्कूल बचा हो। वहाँ
बच्चे तंबू के अंदर बैठकर अपने दोस्तों के नाम याद करते हैं, जो अब नहीं हैं।
ये बच्चे हमसे अलग नहीं
हैं। इन्हें भी चॉकलेट पसंद है, इन्हें
भी कार्टून देखना अच्छा लगता है, इन्हें भी अपने जन्मदिन पर
केक चाहिए। फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है कि इनकी चॉकलेट पर धूल है, इनके कार्टून टूटे हुए टीवी पर हैं, और इनके जन्मदिन
पर कोई केक नहीं, सिर्फ़ एक दुआ होती है कि अगला जन्मदिन भी
नसीब हो।
एक बात जो जो थोड़ा सुकून तो
देती है लेकिन चुभती भी है। ग़ज़ा के बच्चे मुस्कुराते हैं। हाँ, वो मुस्कुराते हैं। उनकी मुस्कान में वो
बेबसी है जिसे देखकर आँखें भर आती हैं। जब कोई बच्चा कैमरे के सामने हाथ हिलाता है,
जब कोई बच्ची अपनी टूटी हुई गुड़िया दिखाती है, जब कोई बच्चा मलबे के ऊपर खड़े होकर पीस का निशान बनाता है, तो वो मुस्कान हमारे ज़मीर पर एक सवाल बन जाती है।
ये मुस्कान कमज़ोरी नहीं
है। ये हिम्मत है। ये उस दुनिया को जवाब है जो इन्हें भूल चुकी है। ये कहती है कि
तुम हमारे घर तोड़ सकते हो, हमारे
ख़्वाब तोड़ सकते हो, मगर हमारी रूह को नहीं तोड़ सकते।
ग़ज़ा में हर माँ की गोद
ख़ाली नहीं होती, मगर हर
माँ की गोद डरी हुई ज़रूर होती है। वो अपने बच्चे को सीने से लगाकर सोती है,
ताकि अगर रात को कुछ हो, तो वो उसे महसूस कर
सके। वो अपने बच्चे का नाम इस तरह लेती है जैसे कोई दुआ पढ़ रहा हो। वो उसके बालों
में हाथ फेरती है और सोचती है कि कल ये हाथ किसके बालों में फिरेंगे।
और जो माँएँ अपने बच्चों
को खो चुकी हैं, उनकी कहानी तो कोई
नहीं लिख सकता। उनकी आँखों में जो ख़ालीपन है, वो किसी
अख़बार की हेडलाइन में नहीं समाता। वो सिर्फ़ एक चीख़ है जो हमेशा गूंजती रहती है,
मगर सुनने वाला कोई नहीं।
ग़ज़ा के बच्चों के खेल अब
बदल गए हैं। पहले वो गली में क्रिकेट खेलते थे, अब वो मलबे के ढेरों पर चढ़ते हैं। पहले वो पतंग उड़ाते थे, अब वो सिर्फ़ आसमान देखते हैं और सोचते हैं कि क्या कोई हेलीकॉप्टर आ रहा
है। पहले वो छुपन-छुपाई खेलते थे, अब वो असल ज़िंदगी में
छुपते हैं।
ये बचपन नहीं है। ये बचपन
का जनाज़ा है। और जो बच्चे इन हालात से गुज़रते हैं,
वो कभी पूरे नहीं होते। वो बड़े ज़रूर हो जाते हैं, मगर अंदर से कहीं टूटे हुए रहते हैं।
हमारी ज़िम्मेदारी क्या है?
अब सवाल ये है कि हम, जो इस जंग से हज़ारों मील दूर बैठे हैं,
क्या कर सकते हैं? हम उनके घर नहीं बना सकते,
हम उनके माँ-बाप वापस नहीं ला सकते, हम उनके
ज़ख़्म नहीं भर सकते। मगर हम एक काम ज़रूर कर सकते हैं, हम
उन्हें भूल नहीं सकते।
हम उनकी कहानियाँ सुन सकते
हैं। हम उनकी तस्वीरें देख सकते हैं। हम उनके नाम याद रख सकते हैं। हम उनके लिए
आवाज़ उठा सकते हैं। हम उनकी मुस्कान को उस दुनिया तक पहुँचा सकते हैं जो उन्हें
देखना नहीं चाहती।
ये कम है, मगर ये कुछ नहीं से बेहतर है। और जब तक हम
उन्हें याद रखेंगे, वो अकेले नहीं होंगे।
आख़िरी बात
ग़ज़ा की टूटी दीवारों के
पीछे जो बच्चे हैं, वो हमारी
इंसानियत का आईना हैं। उनकी बेबस मुस्कान हमें ये बताती है कि दुनिया में अभी भी
कुछ ऐसा बचा है जो टूटा नहीं है। और जब तक वो मुस्कान बची है, तब तक उम्मीद बची है।
हम शायद उनके लिए कुछ बड़ा
न कर सकें। मगर हम ये ज़रूर कर सकते हैं कि हम उन्हें देखें। सच में देखें। बिना
नज़र चुराए। बिना भूलने की कोशिश किए। क्योंकि जिस दिन हमने उन्हें देखना बंद कर
दिया, उस दिन हमने अपनी इंसानियत को भी खो दिया।
और ये मत कहिए कि "हम
क्या कर सकते हैं?" हर
बार जब आप उनकी कहानी किसी को सुनाते हैं, हर बार जब आप उनके
लिए दुआ करते हैं, हर बार जब आप उनकी तस्वीर देखकर ठहर जाते
हैं, आप कुछ तो कर रहे होते हैं। और वो कुछ, उन बच्चों की मुस्कान के लिए बहुत कुछ है।
Shahab KhanAuthor & Storyteller
