उर्दू रस्म-उल-ख़त का सफ़र: सेमिटिक से नस्तालीक़ तक – सिफ़र

ज़रा तसव्वुर कीजिए... एक वक़्त था जब उर्दू की कोई अपनी लिखावट न थी। जो आज हम नस्तालीक़ की ख़ूबसूरत लकीरों में उर्दू लिखते हैं, वो किसी एक दिन का कारनामा नहीं। ये सदियों का सफ़र है, सेमिटिक से अरबी, अरबी से फ़ारसी, फ़ारसी से नस्तालीक़, और फिर नस्तालीक़ से उर्दू तक। हर मरहले में किसी न किसी शख़्स और क़ौम ने, किसी न किसी क़लमकार ने अपना हिस्सा डाला।
उर्दू लिखावट की बुनियाद सेमिटिक (Semitic) ख़त में है। सेमिटिक ज़बानों की ख़ास बात ये है कि इनमें सिर्फ़ हर्फ़-ए-सहीह (consonants) लिखे जाते हैं, हर्फ़-ए-इल्लत (vowels) छोड़ दिए जाते हैं। अरबी ख़त की जड़ें आरामी (Aramaic) और नब्ती (Nabataean) ख़तों में मिलती हैं। नब्ती को अरबी ख़त का वालिद माना जाता है, जो असल में आरामी की एक शाख़ थी।
अरबी से फ़ारसी: जब नए हर्फ़ जुड़े
जब अरबों ने फ़ारस (ईरान) को फ़तह किया, तो फ़ारसी लोगों ने अरबी ख़त अपना लिया। मगर फ़ारसी में ऐसी आवाज़ें थीं जो अरबी में न थीं, जैसे 'پ - प', 'چ - च', 'ژ'। इसलिए फ़ारसियों ने अरबी ख़त में नुक़्ते और नए हर्फ़ जोड़ दिए। इस तरह फ़ारसी-अरबी ख़त (Perso-Arabic Script) वजूद में आया।
डिप्टी नज़ीर अहमद और "रस्म-उल-ख़त"
अब सबसे अहम मोड़। 1877 में डिप्टी नज़ीर अहमद साहब (1836-1912) ने "रस्म उल ख़त" नाम की किताब लिखी, उर्दू की इमला और ख़ुशनवीसी पर लिखी शुरुआती किताबों में से एक है। नज़ीर अहमद साहब का मक़सद था मुब्तदियों को उर्दू लिखावट के उसूल सिखाना और ख़ुशनवीसी की मश्क़ कराना।
उन्होंने 'Ghost Character Theory' पेश की यानी कुछ हर्फ़ लिखने में हैं, बोलने में नहीं आते। वो उर्दू में इस थ्योरी को पेश करने वाले पहले स्कॉलर माने जाते हैं। उनकी किताब मतबा इंस्टिट्यूट, अलीगढ़ से छपी और आज भी रेख़्ता पर मौजूद है। इसी तरह आगे चलकर फ़ोर्ट विलियम कॉलेज (कलकत्ता) ने उर्दू की तदवीन में अहम रोल अदा किया। यहां ब्रिटिश ओरिएंटलिस्ट और हिंदुस्तानियों मुंशियों ने मिलकर उर्दू, हिंदी और बंगाली की नस्र (prose) को स्टैंडर्ड बनाया।
कातिबों का दौर: जब हाथ से लिखी उर्दू छपती थी
शुरूआत में उर्दू अख़बार और किताबें कातिबों (Katibs) के हाथ से लिखी जाती थीं। ये ऐसे ख़ुशनवीस थे जिनकी लिखाई के लिए लाइनें लगती थीं। दिल्ली, लाहौर, लखनऊ, भोपाल और हैदराबाद उर्दू ख़ुशनवीसी के बड़े मर्कज़ थे।
1836 में उर्दू क़ौमी ज़बान बनी और पहला उर्दू अख़बार निकला। 1980 तक कातिबों का काम चलता रहा। मशहूर कातिबों में अनीस सिद्दीक़ी (पाकिस्तान) और ख़लीक़ टोंकी (राजस्थान) के नाम लिए जाते हैं। पुरानी दिल्ली के उर्दू बाज़ार में एक वक़्त बहुत सारे कातिब हुआ करते थे, अब सिर्फ़ चंद गिनती के ही होंगे।
“उर्दू कोई "मुग़लों की देन" भर नहीं है, ये तहज़ीबों का मेल है, जिसमें अरब, फ़ारस, तुर्क और हिंदुस्तान की मिट्टी की ख़ुशबू है। और यही वजह है कि ये ख़त आज भी ज़िंदा है, किताबों में, अख़बारों में, और हमारी ज़ुबान पर।
कंप्यूटर का इंक़िलाब: नूरी नस्तालीक़
नस्तालीक़ को छापने में सबसे बड़ी दिक़्क़त थी कि इसकी लिगेचर्स (जुड़ी हुई शक्लें) बहुत मुश्किल थीं। 1981 में अहमद मिर्ज़ा जमील साहब नाम के ख़ुशनवीस ने 'नूरी नस्तालीक़' नाम का पहला डिजिटल फ़ॉन्ट बनाया। ये मोनोटाइप इमेजिंग के साथ मिलकर बनाया गया। जमील साहब ने करीब 18,000 लिगेचर्स लिखे।
1994 में 'इनपेज' (InPage) सॉफ़्टवेयर आया, जिसने उर्दू के अख़बारी सनअत को हमेशा के लिए बदल दिया।
और आज उर्दू अख़बार, मैगज़ीन और किताबें सब कंप्यूटर पर तैयार होती हैं।
इनपेज(InPage) सॉफ़्टवेयर आने के बाद उर्दू टायपिंग का दौर शुरू हुआ और लोगों का इससे काफ़ी सहूलत हुई लेकिन एक मसला फिर ये भी आया, असल में ये सब शुरू हुआ 1980 के आख़िर में और 1990 के शुरू में, जब अलग-अलग सॉफ़्टवेयर और फ़ॉन्ट अपने-अपने तरीक़े से उर्दू को कंप्यूटर पर लिख रहे थे। इनपेज के भी अपडेटेड वर्ज़न आते गए, इस वजह से एक वर्ज़न में लिखा हुआ उर्दू का मतन दूसरे में पढ़ा ही नहीं जाता था। हर किसी का अपना कोड-पेज, अपना कीबोर्ड, अपनी मर्ज़ी थी। न्यू वर्ज़न की फ़ाइल ओल्ड वर्ज़न में ओपन नहीं होती थी। इसी बिखरे पन को ख़त्म करने की ज़रूरत ने उर्दू यूनिकोड की ज़रूरत को पैदा
दिया। और जैसा कहा जाता है 'ज़रूरत ही हर ईजाद की माँ होती है...' बस यहीं से उर्दू युनिकोड
की ज़रूरत को पूरा करने के लिए लोग अपनी-अपनी मेहनत और कोशिशों मे लग गए।
इसमें सबसे बड़ा नाम है ‘डॉ. अत्ताश दुर्रानी’ (Dr. Attash Durrani) साहब का। सन् 1998 में पाकिस्तान की नेशनल लैंग्वेज अथॉरिटी (National Language Authority) ने उनकी निगरानी में उर्दू एनकोडिंग को स्टैंडर्ड बनाने का काम शुरू किया। इस मेहनत का नतीजा निकला उर्दू ज़ाब्ता तख़्ती (Urdu Zabta Takhti - UZT) के नाम से। जुलाई 2000 में UZT 1.01 को सरकारी तौर पर मंज़ूरी मिली और इसे इलेक्ट्रॉनिक कंप्यूटिंग, कम्युनिकेशन और स्टोरेज के लिए स्टैंडर्ड बना दिया गया।
इसी UZT 1.01 की बुनियाद पर उर्दू को यूनिकोड के वर्ज़न 3.1 और 4.0 में शामिल किया गया। डॉ. अत्ताश दुर्रानी साहब की कोशिशों की वजह से ही उर्दू को दुनिया का वर्ल्ड कोड मिला, जिससे एक ही सॉफ़्टवेयर से अरबी लिखने वाली तमाम ज़बानें प्रोसेस हो सकीं।
यूनिकोड स्टैंडर्ड तो बन गया, मगर अब असली चुनौती थी कि उर्दू को उसकी अपनी ख़ूबसूरत लिखावट (ख़ासकर नस्तालीक़) में कंप्यूटर पर उतारा जाए। यहाँ आया CRULP (Center for Research in Urdu
Language Processing) का नाम। इस इदारे ने सन् 2003 में एक अहम तजवीज़ पेश की, जिसमें उर्दू के हर हर्फ़ के लिए यूनिकोड स्टैंडर्ड में बेहतरीन ग्लिफ़ तजवीज़ किए गए।
इसी सिलसिले की सबसे अहम कड़ी है नफ़ीस वेब नस्ख (Nafees Web Naskh) फ़ॉन्ट, जो सन् 2004 में CRULP ने जारी किया। इस फ़ॉन्ट की ख़ूबसूरती की बुनियाद रखी ‘सैयद जमील-उर-रहमान’ साहब (Syed Jameel-ur-Rehman) ने, जो मशहूर ख़त्तात सैयद नफ़ीस शाह साहब के शागिर्द थे। ये फ़ॉन्ट यूनिकोड स्टैंडर्ड पर पूरी तरह से मबनी था और इसमें तक़रीबन 330 ग्लिफ़ शामिल थे।

उर्दू यूनिकोड की ख़ुसूसियात
अब ज़रा इसकी ख़ूबियों पर भी नज़र डाल लीजिए:
-वाहिद कोड-रेंज (Unique
Code Range): उर्दू के तमाम हर्फ़, अरक़ाम (digits),
और अलामात (punctuation)
के लिए यूनिकोड में एक ख़ास रेंज तय है - U+0600
से U+06FF तक, और कुछ और ग्लिफ़ U+FE70
से U+FEFF में आते हैं। इसका मतलब है कि हर हर्फ़ की एक मुस्तक़िल पहचान है।
मुकम्मल तहज़ीर (Complete Repertoire): इसमें तक़रीबन 46
हर्फ़ (alphabets),
10 अरक़ाम (digits),
6 अलामात (punctuations)
और 6 दियाक्रिटिक्स (diacritics) शामिल हैं। ये तमाम चीज़ें उर्दू को पूरी तरह लिखने के लिए काफ़ी हैं।
अवाज़ों का फ़र्क़ (Vowel Distinction):
अरबी में सिर्फ़ तीन बुनियादी अवाज़ें (vowels) होती हैं, मगर उर्दू में /o/ और /e/ जैसी अवाज़ें भी हैं। यूनिकोड में इन फ़र्क़ों को ज़ाहिर करने के लिए अलग अलामात मौजूद हैं, जैसे U+0656 (Arabic Subscript Alef) और U+0657 (Arabic Inverted Damma)।
उर्दू यूनिकोड भी कोई एक शख़्स की देन नहीं, बल्कि डॉ. अत्ताश दुर्रानी साहब जैसे सरबराहों की कोशिश, CRULP जैसे इदारों की मेहनत, और सैयद जमील-उर-रहमान साहब जैसे ख़त्तातों के हुनर का मेल है। यही वजह है कि आज उर्दू इंटरनेट पर, किसी भी ऐप में, बिना टूटे-फूटे, अपनी पूरी आन-बान के साथ मौजूदगी दर्ज करा रही है।
तो देखा आपने उर्दू का रस्म-उल-ख़त सिर्फ़ अरबी नहीं है। ये सेमिटिक - अरबी - फ़ारसी - नस्तालीक़ - रेख़्ता - उर्दू का सफ़र है। हर मरहले में किसी ने इसमें अपना हिस्सा डाला, फ़ारसियों ने हर्फ़ जोड़े, हिंदुस्तान के माहौल ने नस्तालीक़ को ज़बान दी, डिप्टी नज़ीर अहमद साहब ने इमला के साँचे में ढाला, और अहमद मिर्ज़ा जमील ने इसे कंप्यूटर पर ज़िंदा रखा।
उर्दू ख़त कोई "मुग़लों की देन" भर नहीं है, ये तहज़ीबों का मेल है, जिसमें अरब, फ़ारस, तुर्क और हिंदुस्तान की मिट्टी की ख़ुशबू है। और यही वजह है कि ये ख़त आज भी ज़िंदा है, किताबों में, अख़बारों में, और हमारी ज़ुबान पर।
Culture · Educationनुक़्ता लगाने का शौक़: जब उर्दू के सादे लफ़्ज़ ‘ख़ूबसूरत’ बनाने की कोशिश में मायने ही बिगड़ जाए↗और तफ़सीली मालूमात के लिए इन किताबों मुताला किया जा सकता है :
"रस्म उल ख़त" - मुसन्निफ़ डिप्टी नज़ीर अहमद, (1877)
"उर्दू रस्म-ए-ख़त इर्तिक़ा और जाइज़ा" - मुसन्निफ़ नज़ीर अहमद मलिक, (2004)
तहक़ीक़ी मक़ाले:
इम्तियाज़ जर्नल, कराची यूनिवर्सिटी - रस्म-उल-ख़त की तारीख़ पर मक़ाला
बुनियाद, LUMS - उर्दू रस्म-उल-ख़त के मसादिर पर तहक़ीक़
IIU जर्नल - इंडो-फ़ारसी-अरबी ख़त का इर्तिक़ा और "रस्म उल ख़त" की तदवीन
डॉन - नस्ख और नस्तालीक़ की जंग
Shahab KhanAuthor & Storyteller

