रुपया, डॉलर, अर्थव्यवस्था और राजनीति (व्यंग्य)

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रुपया, डॉलर, अर्थव्यवस्था और राजनीति (व्यंग्य)

रुपया, डॉलर, राजनीति, व्यंग्य

शाम को बाहर  घूमने निकला तो देखा कि सामने से दुबला पतला कमज़ोर सा कोई शख्स लड़खड़ाता हुआ चला आ रहा है।  क़रीब पहुंचा तो देखा उसकी हालत बहुत ज़्यादा ख़राब थी।  थके और लड़खड़ाते क़दमों के साथ वो बड़ी ही मुश्किल से चल पा  रहा था। 
मैंने उससे पूछा भाई कौन हो तुम ? तुम्हारी इतनी बुरी हालत क्यों है ?
उसने बिना नज़रें उठाये धीमी और मायूसी से भरी आवाज़ में जवाब दिया ''रुपया'' । 
उसका एक शब्द में दिया जवाब मेरी समझ में नहीं आया मैंने फिर पूछा कौन हो तुम ? तुम्हारा नाम क्या है ?
उसने मायूसी भरी नज़रों से मेरी तरफ देखा और फिर कहा ''में रुपया हूँ'' वही रुपया जिसे हासिल करने के लिए इंसान रात-दिन भाग दौड़ में लगा हुआ है।  वही रुपया जिसे ''करेंसी'' भी कहा जाता है। 
मैंने कहा सच सच बताओ तुम कौन हो ? तुम रुपया तो हो ही नहीं सकते।  तुम  बहरूपिये हो जो खुद को रुपया बता रहा है।  लोग कहते हैं रुपये में बड़ी ताक़त होती है और तुम्हारी हालत से तो लग रहा जैसे अभी हॉस्पिटल के वेंटीलेटर से उठकर चले आ रहे हो। 

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मैंने कहा सच सच बताओ तुम कौन हो? तुम रुपया तो हो ही नहीं सकते। तुम 
बहरूपिये हो जो खुद को रुपया बता रहा है।  लोग कहते हैं रुपये में बड़ी ताक़त होती है और तुम्हारी हालत से तो लग रहा जैसे अभी हॉस्पिटल के वेंटीलेटर से उठकर चले आ रहे हो। 

मेरी बात सुनकर रुपये के चेहरे की उदासी बढ़  गई।  पहले उसने आसमान की तरफ देखा और फिर मुझसे नज़रें मिलते हुए कहने लगा मैं बढ़ती महंगाई के बोझ से दबा जा रहा हूँ, मुद्रास्फीति (Inflation) बढ़ने के कारण मेरी हालत पहले जैसी नहीं रही, डॉलर के  मुक़ाबले में कमज़ोर होता जा रहा हूँ, डॉलर के मुक़ाबले में मेरी इतनी ख़राब स्थिति कभी नहीं हुई।  नोटबंदी के बाद तो मेरी कमर ही टूट गई है।  ये कहते कहते रुपये का चेहरा रुंआसा सा हो गया। 
मैंने कहा सरकार तो विकास के दावे कर रही है, सरकार का कहना है देश लगातार आगे बढ़ रहा है, देश आर्थिक रूप से मज़बूत हुआ है फिर तुम्हारी हालत इतनी ख़राब क्यों है ? रुपये ने कहा सरकार की बात मत करो उन्हें तो आदत है ''मन की बात'' करने की, हक़ीक़त में हालत क्या है या तो वो जानना नहीं चाहते या फिर जनता को बताना नहीं चाहते।  आओ मेरे साथ तुम्हें हक़ीक़त से रूबरू करवाता हूँ।  इतना कहकर मुझे अपने पीछे आने का इशारा किया।  रुपये ने धीमे और लड़खड़ाते क़दमों से आगे बढ़ना शुरू किया में भी उसके पीछे पीछे चलने लगा।

थोड़ा ही आगे बड़े तो देखा की सामने से एक तगड़ा पहलवान चला आ रहा था।  उसे देखकर मेरे आगे-आगे चल रहा रुपया वहीँ ठहर गया।  मैंने पूछा क्या बात है रुक क्यों गए ? रूपये ने जवाब दिया वो सामने से जो पहलवान चला आ रहा है
जानते हो वो कौन है ? मैंने कहा नहीं।  रूपये ने कहा ये ''डॉलर'' है, सभी करेंसी में सबसे ज़्यादा ताक़वर है इसलिए वो सबको डरा धमकाकर रखता है, बहुत बदमाशी करता है, सब डरते हैं उससे।  इतना कहकर रुपया खामोश हो गया।
डॉलर अकड़ से चलता हुआ हमारे क़रीब पहुंचा और उसने एक घमंड और हिक़ारत भरी नज़र हम दोनों पर डाली और आगे बढ़  गया।  रूपये ने कहा देखा उसका घमण्ड ? 
मैंने जवाब में बस हम्म्म कहा और हम दोनों आगे बड़ गए। थोड़ी दूर चलकर हम एक जगह पहुंचे।  वह एक महिला खड़ी हुई थीं, जो देखने में बहुत कमज़ोर लग रही थीं और लाठी के सहारे से खड़ी हुई थीं। उन्हें देखकर मैंने  रुपये से पूछा ये कौन है ? रुपये ने कहा इन्हे इन्हे नहीं पहचाना ? ये देश की ''अर्थव्यस्था'' हैं। मैं अर्थव्यस्था की ऐसी हालत देखकर हैरान हो गया। 
मैंने कहा ये कैसे हो सकता है ? देश इतनी तरक़्क़ी कर रहा है, लगातार विकास के पथ पर आगे बाद रहा है ऐसे में अर्थव्यस्था की हालत ऐसी कैसे हो सकती है ? अर्थव्यस्था ने जवाब दिया रुपये की क़ीमत लगातार गिरती जा रही है, स्विस बैंक में जमा कालाधन 50 प्रतिशत और बढ़  गया है।  लोग बैंक के करोड़ों रुपये खाकर विदेश भाग रहे हैं, नोटबंदी (Demonetization) का सबसे ज़्यादा असर तो मेरे ऊपर ही पड़ा है ऐसे में मेरी ये हालत तो होनी ही थी। 
मैंने कहा लेकिन सरकार का कहना है की देश आर्थिक रूप से मज़बूत हुआ है और मीडिया भी यही कह रहा है। अर्थव्यस्था ने जवाब दिया मीडिया और सरकार की बात ही मत करो वो हक़ीक़त नहीं बताएँगे। सरकार को मन की बात करने की आदत है और मीडिया को चापलूसी करने की आदत है।  मैंने कहा रूपये से कहा जब लोग देश का पैसा खाकर भाग रहे थे तो तुमने उन्हें रोकने की कोशिश क्यों नहीं की ? रूपये ने कहा जिनकी ज़िम्मेदारी है रोकने की भागने वाला खुद उन्हें संसद में बताकर भागा था वो चाहते तो रोक सकते थे लेकिन नहीं रोका जाओ जाकर उनसे सवाल करो तुम्हे जवाब में देशद्रोही
का होने सर्टिफिकेट पकड़ा दिया जायेगा।

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अचानक आसमान से बिजली सी गिरी, और उसमे से लम्बे शरीर वाली एक भनायक सी आकृति निकलकर सामने आई, उसे देखते ही रुपया लड़खड़ा सा गया और उसके चेहरे का रंग सफ़ेद हो गया उसके चेहरे पर खौफ नज़र आने लगा।  मैंने भयानक सी आकृति से पूछा तुम कोन हो ? और तुम्हे देखकर रुपया इतना डर क्यों गया है? उसने जवाब दिया में ''महंगाई'' हूँ।

अभी हम यह बात कर ही रहे थे की अचानक सामने से काला धुंआ उठने लगा। जब धुंआ छटा तो देखा एक बहुत ही बड़ा और भयानक सा आदमी नज़र आ रहा है, जिसने काले कपडे पहने हैं, वो हमारी और देखकर ज़ोर ज़ोर से हंस रहा है।  मैने पूछा कौन हो तुम ? उसने जवाब दिया ''कालाधन''।  मैंने कहा अच्छा तो तुम ही हो वो कालाधन, तुम्हे पता भी है देश में जो ये इतनी सारी परेशानियां हैं उसकी एक बहुत बड़ी वजह तुम भी हो।  तुम्हारे ऊपर लगाम लगाकर उन सभी परेशानियों को काफी हद तक काम किया जा सकता है।  देश में हुई नोटबंदी (Demonetization) की सबसे बड़ी वजह भी तुम ही थे,  नोटबंदी (Demonetization) तुम पर लगाम लगाने के लिए की गई थी और तुम अभी भी आज़ाद घूम रहे हो, तुम्हे पता भी है नोटबंदी (Demonetization) की वजह से देश की आम जनता को कितनी परेशानियों का सामना करना पड़ा था, लगभग 100 से भी ज़्यादा लोगों की मौत हो गई थी। सब कुछ तुम्हारी वजह से हुआ और तुम्हे इससे कोई खास फ़र्क़ ही नहीं पड़ा।  मेरी बात सुनकर वो मंदमंद मुस्कुराने लगा।  उसे मुस्कुराते देखकर मुझे गुस्सा आया और मैंने कहा अच्छा हुआ जो तुम खुद  ही सामने आ गए अब तुम्हारी खैर नहीं, अब तुम नहीं बच सकते।  
मेरी बात सुनकर कालेधन ने ज़ोरदार ठहाका लगाया और कहने लगा मुझे कौन पकड़ेगा ? अगर मुझे पकड़ना इतना आसान होता तो कब का पकड़ा गया होता, उद्योपति, राजनेता, अधिकारी, सेलेब्रटी सब से मेरी दोस्ती है  तुम मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकते और अब तो रिज़र्व बैंक में भी 99% पैसे वापस आ गया है समझे क्यों ? क्योंकि चालाकी से कालेधन को सफ़ेद बना दिया गया है। इतना कहकर एक और ज़ोरदार ठहाका लगाकर वहां से गायब हो गया।
मैंने रूपये और अर्थव्यस्था की तरफ देखा दोनों के चेहरे पर मायूसी थी। अचानक आसमान से बिजली सी गिरी,  और उसमे से लम्बे शरीर वाली एक भनायक सी आकृति निकलकर सामने आई, उसे देखते ही रुपया लड़खड़ा सा गया और उसके चेहरे का रंग सफ़ेद हो गया उसके चेहरे पर खौफ नज़र आने लगा। 
मैंने भयानक सी आकृति से पूछा तुम कोन हो ? और तुम्हे देखकर रुपया इतना डर क्यों गया है ? उसने जवाब दिया में ''महंगाई'' हूँ, मेरे सामने रुपये की ऐसी हालत तो होनी ही थी।  उसे देखकर मेरे सब्र का बांध टूट गया और मैंने कहा तुमने हमारा  जीना हराम कर रहा है।  हर दिन बढ़ती जाती हो, तुम्हारी वजह से गरीब मर रहे हैं, देश में लोग कितने मुश्किल  हालात से गुज़र रहे हैं तुम्हें इसका अंदाजा भी है ? महंगाई ने कहा इसमें मेरा कोई दोष नहीं नहीं है, मेरा तो काम ही लगातार बढ़ते रहना, इसमें मुझे दोष मत दो।  तुम्हे क्या लगता है जनता की सारी परेशानियों की वजह सिर्फ मैं हूँ? 
मैंने कहा हाँ।  महंगाई ने कहा ये तुम्हारी ग़लतफ़हमी है, हर समस्या पर क़ाबू किया जा सकता है चाहे वो महंगाई,
कालाधन, रुपये की कमज़ोरी हो, गिरती अर्थव्यवस्था हो या चाहे कोई भी छोटी बड़ी समस्या हो सब पर काबू किया जा सकता है। 
मैंने पुछा ऐसे कैसे होगा ? महंगाई ने कहा उसके लिए सही नीतियां बनाकर उनका ईमानदारी से पालन करना होगा, राजनेताओं को हर चीज़ में अपना राजनैतिक फायदा छोड़कर सबसे पहले देश और जनता के फायदे के बारे में सोचना होगा तभी हर समस्या का समाधान होगा। 
मैंने कहा बात तो तुम्हारी सही है, रुपये और अर्थव्यस्था ने भी मेरी हाँ में हाँ मिलते हुई अपनी अपनी सहमति जताई।

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मैंने रुपये और अर्थव्यस्था की तरफ देखा दोनों के चेहरे पर मायूसी से भरी ख़ामोशी
थी, महंगाई की तरफ देखा तो वो और बढ़कर आसमान छू रही थी, रुपया ज़मीन पर
बेहोश पड़ा था और राजनीति हमारी और देखकर मंदमंद मुस्कुरा रही थी।

हम बात कर ही रहे थे की सामने से ''राजनीति'' आती दिखाई दी, उसके पीछे पीछे ''साम्प्रदायिकता'', ''जातिवाद'', ''अवसरवाद'', ''भ्रष्टाचार'' भी चले आ रहे थे।  
क़रीब आते ही राजनीती ने कहा तुम सब चिंता मत करो मैं हूँ न सब ठीक हो जायेगा। इतनी देर में ''साम्प्रदायिकता'', ''जातिवाद'', ''अवसरवाद'', ''भ्रष्टाचार'' भी राजनीती के कंधे से कन्धा मिलकर खड़े  गए।  
मैंने रुपये और अर्थव्यस्था की तरफ देखा दोनों के चेहरे पर मायूसी से भरी ख़ामोशी थी, महंगाई की तरफ देखा तो वो और बढ़कर आसमान छू रही थी, रुपया ज़मीन पर बेहोश पड़ा था और राजनीति हमारी और देखकर मंदमंद मुस्कुरा रही थी।
✍शहाब ख़ान 'सिफ़र'
#सिफ़रनामा

Shahab Khan signatureShahab KhanAuthor & Storyteller
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