गधों की सभा (व्यंग्य)

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गधों की सभा (व्यंग्य)

gadhon ki sabha

एक घने जंगल के बीचोबीच एक छोटा-सा मैदान था। वहां एक अजीब-सी हलचल मची थी। गधों का एक बड़ा झुंड जमा था, और माहौल कुछ उत्सव जैसा था। खबर आई थी कि गधों की एक “महासभा” बुलाई गई है, और इस सभा में कुछ बेहद अहम फैसले लिए जाएंगे।
सभा का आयोजन ‘गदाधर’ नामक अनुभवी गधे ने किया था, जिसे जंगल के सभी गधों का लीडर माना जाता था। गदाधर ने अपने लंबे, हौले-से हिलने वाले कानों को गर्व से फड़फड़ाते हुए सभा की शुरुआत की। उसके साथ कुछ और भी ‘विशेष’ गधे थे, जिन्हें गदाधर ने खुद चुनकर मंच पर बिठाया था। इन गधों के सिर पर रंग-बिरंगे फूल मढ़े हुए थे और कुछ के गले में माला तक लटकी हुई थी। वे मंच पर बैठे अपने पद का घमंड दिखा रहे थे।

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सभा खत्म होने के बाद गधे अपने-अपने ठिकानों पर लौट आए। उनके मन में एक नई
उम्मीद थी कि अब वे जंगल में एक खास पहचान के साथ जिएंगे। लेकिन हकीकत में,
गधों के जीवन में कोई खास बदलाव नहीं आया। वे अब भी बोझा ढोते, घास चरते
और हर सुबह ज़ोर-ज़ोर से हिनहिनाते थे।

सभा शुरू होते ही गदाधर ने कहा, “आज हमारे समाज के उत्थान का दिन है! हम गधों का जीवन यूंही घास खाकर और बोझा ढोकर नहीं कटना चाहिए। हमें खुद का सम्मान करना चाहिए, खुद का विकास करना चाहिए। इस सभा में हमें ऐसे निर्णय लेने होंगे जो गधों के भविष्य को नई दिशा देंगे!”
यह सुनकर बाकी गधों ने जोर-जोर से हिनहिनाना शुरू कर दिया। उन्हें लगा कि शायद आज सच में कुछ बड़ा होने वाला है।
लेकिन तभी एक युवा गधा, जिसे सभा में आने की अनुमति विशेष तौर पर दी गई थी, उठ खड़ा हुआ और बोला, “पर हमें विकास के लिए करना क्या है? हमें खुद का भविष्य बेहतर कैसे बनाना है?”
गदाधर के कान थोड़े सिकुड़ गए। सवाल के जवाब में उसने धीरे-धीरे सिर हिलाते हुए कहा, “पहला कदम तो यही है कि हम अपनी पहचान बनाए रखें। जैसे दूसरे प्राणी अपना अधिकार जताते हैं, वैसे ही हमें भी अपनी पहचान और शक्ति का प्रदर्शन करना चाहिए। सबसे पहले हम यह तय करेंगे कि हमें इस जंगल में गधों के लिए एक विशेष क्षेत्र मिलना चाहिए, जिसे हम ‘गधा क्षेत्र’ कहेंगे।”
सभा में बैठे गधों ने फिर जोरदार आवाज में समर्थन किया। उन्हें इस बात का भान भी नहीं था कि इस निर्णय से उनका असल जीवन कैसे बदलेगा। उनके लिए तो यह सिर्फ एक नई बात थी, जिसमें मज़ा आ रहा था।
फिर गदाधर ने अपने एक सहयोगी गधे, ‘कानों’ को बुलाया, जो कि सभा का प्रवक्ता था। कानों ने हिनहिनाते हुए घोषणा की, “अब से हम सभी गधों को हर रोज़ ‘गधा घोष’ करना होगा। इससे हमारी एकता और हिम्मत दिखेगी। हर सुबह हम जोर से हिनहिनाएंगे, ताकि जंगल के दूसरे प्राणी भी जानें कि हम हैं और हमारा भी अस्तित्व है!”
गधों ने फिर हिनहिनाना शुरू किया। उनका जोश देखते ही बनता था। उन्हें लगता था कि ‘गधा घोष’ करने से उनकी प्रतिष्ठा बढ़ जाएगी।

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एक गधे ने सुझाव दिया कि गधों के लिए शिक्षा का इंतज़ाम होना चाहिए। “गधे
भी बुद्धिमान हो सकते हैं!” उसने गर्व से कहा। लेकिन गदाधर ने तुरंत टोकते
हुए कहा, “शिक्षा से ज़्यादा हमें अपनी ‘गधापन’ की पहचान पर ध्यान देना
चाहिए। हम जैसे हैं, वैसे ही अच्छे हैं। हमें दूसरों की नकल नहीं करनी
चाहिए!”

सभा की गंभीरता देखकर पास के पेड़ पर बैठे बंदर, तोता और कुछ दूसरे जानवर भी हंसी रोक नहीं पाए। तोता फुसफुसाया, “ये गधे क्या सोचते हैं कि चिल्लाने से कोई इन्हें समझने लगेगा?”
पर गधे जोश में थे, उन्हें किसी दूसरे की बातों से क्या लेना-देना था!
सभा में कुछ और फैसले लिए गए। एक गधे ने सुझाव दिया कि गधों के लिए शिक्षा का इंतज़ाम होना चाहिए। “गधे भी बुद्धिमान हो सकते हैं!” उसने गर्व से कहा। लेकिन गदाधर ने तुरंत टोकते हुए कहा, “शिक्षा से ज़्यादा हमें अपनी ‘गधापन’ की पहचान पर ध्यान देना चाहिए। हम जैसे हैं, वैसे ही अच्छे हैं। हमें दूसरों की नकल नहीं करनी चाहिए!”
इस पर सभा में तालियां बजने लगीं। सभी गधों को लगा कि गदाधर के पास सचमुच बहुत गहरी समझ है।
धीरे-धीरे सभा का अंत होने लगा। अंत में गदाधर ने एक घोषणा की, “अब हम एक ‘गधा प्रतिनिधि’ चुनेंगे, जो हमारे अधिकारों की रक्षा करेगा और हमारे मुद्दों को जंगल के बाकी जानवरों के सामने रखेगा। यह प्रतिनिधि पूरी तरह गधों के हित के लिए काम करेगा।”

सभी गधों ने खुशी से अपने पसंदीदा प्रतिनिधि के लिए चिल्लाना शुरू कर दिया। लेकिन भीतर ही भीतर हर गधे को मालूम था कि प्रतिनिधि चुनने का निर्णय गदाधर और उसके खास गधों का ही होगा। आखिरकार, ‘गधा प्रतिनिधि’ के पद के लिए उसी गधे को चुना गया जिसे गदाधर पसंद करता था।
सभा खत्म होने के बाद गधे अपने-अपने ठिकानों पर लौट आए। उनके मन में एक नई उम्मीद थी कि अब वे जंगल में एक खास पहचान के साथ जिएंगे। लेकिन हकीकत में, गधों के जीवन में कोई खास बदलाव नहीं आया। वे अब भी बोझा ढोते, घास चरते और हर सुबह ज़ोर-ज़ोर से हिनहिनाते थे।
जंगल के बाकी जानवरों के लिए यह सभा केवल एक मजाक बनकर रह गई थी। बंदर, तोता और हिरण सभी हंसते हुए कहते, “गधे भले ही कितनी सभाएं कर लें, वे अपनी असलियत नहीं बदल सकते। वे बस खुद को बड़ा दिखाने में लगे हैं, पर असल में सब कुछ वैसा का वैसा ही है।”
इस प्रकार, गधों की यह महासभा बस हिनहिनाहट, नारे और खोखली घोषणाओं तक ही सीमित रह गई। गधों को अपने हालात बदलने से ज्यादा अपनी पहचान बनाए रखने की चिंता थी।
शहाब ख़ान 'सिफ़र'
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Shahab Khan signatureShahab KhanAuthor & Storyteller
TOPICS:SatireSociety

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