रुपया, डॉलर, राजनीति, व्यंग्य
Hindi · Economics · Politics · Satire · Society · 15 min read

रुपया, डॉलर, अर्थव्यवस्था और राजनीति (व्यंग्य)

मेरी बात सुनकर रुपये के चेहरे की उदासी बढ़ गई। पहले उसने आसमान की तरफ देखा और फिर मुझसे नज़रें मिलते हुए कहने लगा मैं बढ़ती महंगाई के बोझ से दबा जा रहा हूँ, मुद्रास्फीति (Inflation) बढ़ने के कारण मेरी हालत पहले जैसी नहीं रही, डॉलर के मुक़ाबले में कमज़ोर होता जा रहा हूँ, डॉलर के मुक़ाबले में मेरी इतनी ख़राब स्थिति कभी नहीं हुई। नोटबंदी के बाद तो मेरी कमर ही टूट गई है। ये कहते कहते रुपये का चेहरा रुंआसा सा हो गया।