SHAHAB KHAN · POETRY
चाय – उर्दू नज़्म – शहाब ख़ान ‘सिफ़र’
Chay Urdu Poetry By Shahab Khan 'Sifar
ये चाय भी क्या अजीब शय है,
बुझती नहीं, बस सुलगती रही है।
कप में भरी, एक रुत की कहानी,
हर घूँट जैसे शिकायत रही है।सर्दियों की ठिठुरती वो शामें,
इसमें कहीं घुल के बैठी हुई हैं।
और गर्मियों की वो सूनी दोपहर,
गर्म साँसों में उलझी हुई हैं।चाय के संग कुछ रंजिशें बैठीं,
कुछ ख़ुशगवार अफ़साने लिखे हैं।
कभी महफिलों की शिरकत बनी ये,
कभी तन्हाई में बहलाने लिखे हैं।इश्क़ में जैसे हो नर्म कोई लम्हा,
वैसे ही इसमें मिठास-सा असर है।
और कभी तल्ख़ किसी बात जैसा,
इसकी तलछट में बसा-सा सफ़र है।तो आओ, ये चाय खत्म करें अब,
इसकी हर सदा को सुना-सा जाए।
मगर क्या पता, ये आख़िर का प्याला,
फिर किसी शाम को बुला-सा जाए।~शहाब ख़ान ‘सिफ़र’