SHAHAB KHAN · POETRY
ज़र्रा समझकर मिटाने चला था, आफ़ताब बनकर चमकने लगा | शहाब ख़ान ‘सिफ़र’
सख़्त सवालों के घेरे से लेकर इंक़िलाब की चिंगारी तक, यह कविता ज़ुल्म, ख़ौफ़, हक़ की आवाज़ और एहतिजाज के उस सफ़र को बयान करती है जहाँ एक छोटी सी आवाज़ धीरे धीरे एक बड़ी आवाज़ बन जाती है।
सख़्त सवालों के घेरे से लेकर इंक़िलाब की चिंगारी तक, यह कविता ज़ुल्म, ख़ौफ़, हक़ की आवाज़ और एहतिजाज के उस सफ़र को बयान करती है जहाँ एक छोटी सी आवाज़ धीरे धीरे एक बड़ी आवाज़ बन जाती है।